Wednesday, February 27, 2008

तेरा मन इक छवि

पता भी नहीं चला कब मैं तुझसे
और तू मुझसे जुड़ गया
कुछ तरंगें उठीं तन मन से मेरी
कुछ तरंगें उठीं तन मन से तेरी
सुनीं तो जलतरंग सा बज गया ।
तू अपनी डगर
मैं अपनी डगर
को चल पड़ी ।
जब भी कोई बाधा आई
याद हमने इक दूजे को कर लिया ।
चेहरे को तेरे नहीं
मैंने देखा ध्यान से
पर मानस पटल पर
तेरा मन इक छवि
बन छप गया ।
घुघूती बासूती

Monday, February 25, 2008

काल

मैं प्रतिदिन थोड़ा और मर रही हूँ
किसी दिन कुछ अधिक
तो किसी दिन थोड़ा कम
इस नित दिन मरने से
क्या एक बार ही
पूरा का पूरा मरना
कुछ बेहतर ना होगा?
क्या एक बार में ही
काल, तुम मुझे नहीं मार सकते?

मैं थक गई हूँ
बेहद थक गई हूँ
या तो मुझे मार लो
या मुझे कुछ थमकर साँस लेने दो
ताकि फिर से मैं
इस असमान युद्ध में कूद सकूँ
और काल, बन सकूँ मैं
तुम्हारे मनोरंजन का साधन !

परन्तु क्या तुम्हें पता है
कि तुम भी हो मेरे
मनोरंजन का ही एक साधन
क्योंकि मैं थक चाहे जाऊँ
ऊब भले ही जाऊँ
तुमसे लड़ते लड़ते
परन्तु हारती मैं
कभी नहीं हूँ ।

मरने पर भी नहीं हारूँगी
नहीं होगी एक बेबसी मुझमें
तुम सोचोगे कि यह विजय है तुम्हारी
परन्तु देखोगे तो मेरे अधरों पर
एक मुस्कुराहट
कुछ ऐसी जैसे
तुम भी रहे हो
सदा से मेरे मन बहलाव
के ही एक साधन !

घुघूती बासूती

Wednesday, February 20, 2008

हिमपात ने जमाया सुन्दर फूलों को !

बिटिया और उसके पति शून्य से १४ डिग्री सी कम तापमान वाले क्षेत्र में रह रहे थे । तब उन्होंने अपने घर के बाहर इन जमें हुए फूलों की फोटो खींची । इसमें मेरे प्रिय रंग हैं । आँखों को भाने वाले व आराम देने वाले रंगों वाली इस फोटो को मैंने नया हैडर बना दिया ।
आपको कैसा लगा?
घुघूती बासूती

Tuesday, February 19, 2008

मेरे लिए झाँसी की रानी का पोस्टर क्यों नहीं ?

माँ बहुत ही क्रान्तिकारी सी रही थीं जीवन भर । बहुत सी बातें हैं जिनके लिए मैं उनका बहुत आदर करती हूँ । जैसे १२ वर्ष की आयु में जब वे विवाह कर गाँव गईं तो उन्होंने घूँघट निकालने से साफ मना कर दिया । आज चोखेरबाली http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.htmlमें जब बन्धनों की बात हुई तो भी मुझे अपनी माँ पर गर्व हुआ । वह तो यही कहती थीं कि ‘अभी समय है जो मन में आए पहनो । बाद में क्या होगा क्या पता ।’ ना कभी उन्होंने दृष्टि नीची करने का सुझाव दिया । वैसे गाँव में जहाँ दरवाजे नीचे होते हैं सिर भटकने पर चाचाजी से 'चेलियाँ की चौड़ नजर' (लड़कियों को दृष्टि नीची रखनी चाहिये सा कुछ) बहुत सुनते थे । ऐसा लगता था कि वे मजाक करते थे । और वैसे भी हम कभी- कभार ही तो गाँव जाते थे और पकृति ने चौड़ नजर दी या नहीं परन्तु 'चौड़ कद' तो दे ही दिया । सो मेरा सिर बहुत कम दरवाजों पर ही भटकता था ।

हमारे बाहर जाने, खेलने कूदने, शोर मचाने, भरी दोपहरी छत पर चढ़ने पर उन्होंने कभी रोक- टोक नहीं लगाई । ना उन्होंने हमारे लिए हमारा जीवन निर्धारित करने का प्रयास कभी किया । सदा हमें सबसे आगे रहने, जीवन में उनसे व पिताजी से आगे बढ़ने को कहा । परन्तु जब से मेरी अपनी उम्र बढ़ी है व वे वृद् हुईं हैं, उनसे बहुत से वैचारिक मतभेद, विशेषकर स्त्रियों पर,होते रहते हैं ।

कुछ बातें बचपन मे् भी कचोटती थीं । आज जब गाहे बगाहे http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.htmlमें विनीतकुमार जी की पोस्ट पढ़ी तो वह बात याद आ गई । और याद आईं बहुत सी और बातें भी जो प्रगतिशील माता पिता भी जाने अनजाने में कर देते हैं ।

माँ सदा कहती थीं कि भाई के जन्म से पहले उन्होंने दिवार पर सरदार पटेल का पोस्टर लगा रखा था ताकि सदा आँखों के सामने रहे । वे सरदार पटेल सा बच्चा चाहती थीं । भाई कितने अच्छे थे, बचपन भर व अब भी, यह मैं http://ghughutibasuti.blogspot.com/2008/02/blog-post_17.htmlमें बता चुकी हूँ । परन्तु मुझे सदा यह आश्चर्य होता था कि वे कभी मेरे जन्म से पहले लगाए गए पोस्टरों या मेरी दोनों बड़ी बहनों के जन्म से पहले ऐसा कुछ किये की बात नहीं करती थीं । सबसे बड़े भाई के बचपन की भी बहुत बातें बताती थीं । मेरे बचपन की भी कुछ बताती थीं । वैसे मुझे स्वयं ही तीन चार वर्ष के बाद की बहुत सी याद रखने लायक बातें ऐसे याद हैं जैसे मैं आज भी उन्हें चलचित्र सा देख रही होऊँ । बचपन भर मैंने माँ से यह प्रश्न नहीं पूछा । परन्तु अब जब भी वे उस पोस्टर की बात करती हैं तो मेरा मन यही पूछने का होता है कि मेरे जन्म से पहले कौन सा पोस्टर लगाया था और कई बार पूछ भी लेती हूँ। एक- आध बार तो यह भी पूछ चुकी हूँ कि क्या 'झाँसी की रानी' के पोस्टर/ चित्र नहीं मिलते थे । कई बार वे कह भी देती थीं कि ‘तुम तो मेरे बिना झाँसी की रानी को देखे ही तलवार उठाए रहती हो !’

परन्तु यह पूछना सैक्रिलेज (उनकी प्रिय पवित्र भावनाओं, आस्थाओं का अपमान सा )लगता है । यह क्यों होता है कि जो प्रश्न पूछे जाने चाहिये उन्हें पूछने पर स्वयं ही दुख होता है कि क्यों पूछकर आरोप लगा रही हूँ । परन्तु यह तो सच है कि जिस घर में बेटे होते थे उन घरों में बेटियों का बचपन आमतौर पर विस्मर्णीय ही रहता था ।

घुघूती बासूती

Monday, February 18, 2008

मुझे मेरे फोन से बचाओ ! सताता है, घंटी बजाता है, घुघूता जी से बतियाता है !

मुझे मेरे फोन से बचाओ ! सताता है, घंटी बजाता है, घुघूता जी से बतियाता है !

आज सुबह- सुबह फोन की घंटी बजी तो मैंने फोन उठाया । यूँ तो जब पति घर में होते हैं तो मैं फोन कभी नहीं उठाती । पति के साथ साथ किसी भी फोन को आराम नहीं मिलता है । हम विभिन्न फोनों को कुछ इस वर्गीकरण से जानते हैं .. इन्टर्नल, एक्सटर्नल (इसमें भी कम्पनी का और पर्सनल ), मोबाइल नोकिआ, मोबाइल रिलायन्स व हमारा कभी ना बजने वाला मोबाइल । घर के हर कमरे में सारे कनैक्शन हैं ताकि जहाँ भी पति हों वे फोन का उपयोग कर सकें । कॉर्डलैस फोनों के होने पर भी यह व्यवस्था रखनी पड़ती है क्योंकि कॉर्डलैस फोनों को भी चार्ज होने को समय चाहिये । इन सबके अलावा एक लाइन हमारे नेट की भी है । उस दिन नेट ठीक करने आया व्यक्ति सुझाव दे रहा था कि उस लाइन पर भी फोन लगा सकते हैं । मैंने कहा नहीं भाई, हमारा दुख और ना बढ़ाओ ।
मैं तो हूँ टोन डैफ, अलग अलग गायकों में भेद नहीं कर सकती तो फोन की घँटियों का क्या अन्तर कर पाऊँगी ? एक बजता है तो तीन उठा कर देखने पड़ते हैं । उसपर यह कि मित्र व रिश्तेदार, सम्बंधी फोन पर नाम नहीं बताते और मैं अनुमान ही लगाती रह जाती हूँ । कई बार तो दस बारह मिनट के बाद पता चलता है कि मैं किससे बात कर रही थी अपनी भाभी से या पति की ।
बात चल रही थी आज सुबह सुबह फोन की घंटी बजने की परन्तु वह बात आधी रह गई क्योंकि मैं फिर फोन उठाने चली गई थी । वह फोन मैं इनकी भाभी का समझकर बात करती रही परन्तु निकली मेरी भाभी ! वह पता तब चला जब उन्होंने मेरी भतीजी का विवाह करने का निर्णय बताया । हम्म, आज सुबह फोन उठाया तो वहाँ से एक स्त्री स्वर आया ....
‘‘यह क्या बासूता जी का घर है ।’’
‘‘हाँ, मैं, श्रीमती बासूता बोल रही हूँ । ’’
‘‘बासूता जी हैं क्या ?’’
‘‘नहीं वे बाहर गए हुए हैं ।’’
‘‘तुम कैसी हो ?’’
‘‘मैं ठीक हूँ । मैंने आपको पहचाना नहीं ।’’
‘‘मैं श्रीमती राठौर बोल रही हूँ ।’’.............अब यहाँ एक राठौर हैं जिनकी पत्नी कभी यहाँ तो कभी बच्चों के पास रहती हैं । एक राठौर कुछ समय पहले नौकरी छोड़ कर गए हैं । परन्तु दोनों महिलाएँ मुझे तुम नहीं कहेंगी ।
‘‘आप कहाँ से बोल रहीं हैं ?’’
‘‘मैं नोयडा से बोल रही हूँ ।’’......मन होता है कि पूछूँ कि मेरी जान पहचान वाली कोई भी श्रीमती राठौर नोयडा में क्या कर रही हैं और आज अचानक मुझे तुम क्यों कह रहीं हैं ।
मैं थोड़ी प्रतीक्षा करती हूँ कि कोई हिन्ट मिलेगा ।
‘‘तुम कैसी हो बेटा ?’’.......... बेटा ???? यह हमारी जान पहचान वाली दोनों श्रीमती राठौरों में से एक भी नहीं हो सकतीं ।
‘‘मैं ठीक हूँ ।’’
‘‘बच्चे कैसे हैं ?’’
‘‘वे भी ठीक हैं ।’’
‘‘घुघूता जी क्या काम से बाहर गए हैं ?’’
‘‘जी कम्पनी के काम से गए हैं ।’’
‘‘यह बाहर जाने का काम बड़ा खराब है । तुम घर में अकेली रह जाती हो ।’’
‘‘जी ।’’
‘‘जब तक बच्चे घर पर थे तब तक भी ठीक था ।’’
‘‘जी ।’’
‘‘अपना मन कैसे लगाती हो ?’’
‘‘यही आजकल कम्प्यूटर पर थोड़ा लिख पढ़कर ।.’’.. आश्चर्य होता हे कि जिन श्रीमती राठौरों को कभी ‘मैडम मत कहिये’, कहने पर भी वे नहीं सुनती थीं आज क्या हो गया है ।
बेटा, बिटिया कहाँ है आजकल ?........बेटा !!!!!!!!!!! बिटिया? मेरी तो दो बेटियाँ हैं, यह एक का ही हालचाल क्यों पूछ रहीं हैं ?
“देखिये , आपने किन घुघूता जी के घर फोन लगाया था ?”
“मैंने ......... न. पर फोन लगाया ।“......... मैं डायरी में देखती हूँ नम्बर तो हमारा ही है ।
“पूरा नाम बताइये । शायद आप गलत घुघूता जी के यहाँ फोन कर रहीं हैं । शायद आपको जो घुघूता जी ५ साल पहले रहते थे वे चाहिये ।”
“क्या यह के. बी. घुघूता जी का घर नहीं है ?”
“नहीं ।”
“तुम यहाँ कितने साल से हो ?”
“तीन ।”
“ओहो ! सॉरी बेटा । मैं तो जो ८ साल पहले रहते थे उनसे बात करना चाहती हूँ । हम उनके साथ ही कई साल रहे ।”
“वे तो अब मुम्बई में हैं । ”
“उनका नम्बर है तुम्हारे पास ? ”
“जी नहीं । अपने पति से पूछ लूँगी यदि हुआ तो रख लूँगी ।”
“ठीक है बेटा । तुमसे बात करके अच्छा लगा । ”
“मुझे भी ।”............. इस उम्र में कोई सुबह सुबह बेटा कहे तो अच्छा तो लगेगा ही ।
“माफ करना मैंने तुम्हें तंग किया ।”
“नहीं, कोई बात नहीं । आपने तंग नहीं किया ।”...............हम किसी महानगर में तो रहते नहीं, जो हर समय झल्लाए रहें, वैसे भी कम ही होता है कि रॉन्ग नम्बर ( यह तो रॉन्ग नम्बर था भी नहीं ! नम्बर सही था केवल घुघूता गलत थे ।) हिन्दी में आए । आमतौर पर जो आते हैं वे कुछ यूँ होते हैं ।
“बुद्धिबेन छे ? ”
“नहीं । यह गलत नम्बर लगा है ।”
“तमा कौन बोल्ले छे बेन ? ”... मन करता है कि कहूँ निर्बुद्धि बेन ।
“भाई यह नम्बर गलत है । ”मैं फोन रख देती हूँ ।
फिर फोन.....
“बुद्धिबेन ! ”
“नहीं गलत ! ”……. बुद्धि ही तो नहीं है !
“बुद्धिबेन ना बुळावो ना बेन । म्हारे को काम छे ।”
“यह गलत नम्बर लगा है ।”
“बेन अपना नम्बर बताओ तमे ।”... ...मैं बता भी दूँ यदि याद हो तो ।
“आपको कौन सा नम्बर चाहिये ।”
“तुम अपणा बताओ ।”.. फोन बन्दकर प्लग ही निकाल देती हूँ ।

घुघूती बासूती

नोट:
बासूता के स्थान पर दरसल एक अत्यन्त सामान्य , उत्तर भारत में हर दसवें व्यक्ति का सरनेम है ।

Sunday, February 17, 2008

अरे बट्टा की ये तो कील है !

मैं लगभग ८ वर्ष की रही होऊँगी जब पिताजी की बदली पंजाब से मध्य प्रदेश हो गई । मुझसे बड़े भाई ११ वर्ष के । हम बच्चों की भाषा में जबर्दस्त पंजाबी का पुट था । हम सब पैदा ही पंजाब में हुए थे । हमें मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की भाषा विचित्र लगती थी और वहाँ के लोगों को हमारी । वहाँ जाकर हमें वहाँ की आँचलिक हिन्दी भाषा सीखने में देर नहीं लगी । वहाँ की भाषा जितनी मुझे याद है कुछ ऐसी थी ...

मौढ़ी =लड़की
मौढ़ा= लड़का
ढुकरिया=वृद्धा
ढोकरा= वृद्ध
मास्साब= मास्टर जी
हल्ला करना = गुस्सा करना
बंबा= नल

अधिक सीखने को नहीं मिला क्योंकि हम वहाँ केवल तीन वर्ष रहे । परन्तु आज यदि मेरी भाषा में कुछ अच्छा है तो वह उन्हीं तीन वर्षों की देन है । वहाँ के अध्यापकों के लिए जो आदर हमारे मन में है वह बहुत कम ही देखा जा सकता है ।

खैर, आपको किस्सा सुनाती हूँ । भाई का मुझपर बहुत अधिक स्नेह था । वे मुझपर अधिकार भी बहुत अधिक जताते थे । हम सदा साथ खेलते थे । जो खेल भाई खेलें, चाहे वह कबड्डी हो, क्रिकेट हो, मारम- पीटी हो, सितौलिया (पिट्ठू) हो,हॉकी हो,मुझे साथ अवश्य लेते थे । गर्मियों में सारा दिन हम खेलते रहते । बाहर खस के परदे व टटिया लगी होतीं और घर शिमला जैसा ठंडा,परन्तु हम धूप में खेलते रहते । हम दोनों की विशेषता यह थी कि हम कभी एक दूसरे की शिकायत नहीं लगाते थे । हमें कोई अलग भी नहीं कर सकता था । भाई मुझे रुला भी देते था तो माँ के डाँटने पर मैं यही कहती थी कि यह हमारा आपसी मामला है, आप क्यों कुछ कह रहीं हैं ।


गरमियों की छुट्टियाँ आईं तो पिताजी ने भाई के लिये साइकल खरीदी । जल्दी ही भाई उसे चलाना सीख गए । अब वे चलाएँ तो मुझे तो घर छोड़ नहीं सकते थे । जब तक वे सीख रहे थे मैं उनके साथ- साथ भागती थी । सीखने पर वे मुझे पीछे बैठाने की जिद करने लगे । थोड़ा भय तो था कि अभी नया- नया सीखें हैं,परन्तु उनकी किसी भी प्रतिभा में संशय करना तो भाई- द्रोह हो जाता ! सो मैं उनके पीछे कैरियर पर बैठ गई । हम लोगों के खेलने के लिए बहुत लम्बा- चौड़ा मैदान था । एक बहुत लम्बी सीमेन्ट वाली सड़क थी । इतनी छोटी जगहों पर भीड़- भाड़ का तो प्रश्न ही नहीं उठता था । बस हम बच्चे ही होते थे वहाँ ।


भाई को चलाने में मजा आ रहा था । वे तेज और तेज चला रहे थे और मैं,उन्हें धीरे चलाने का आग्रह कर रही थी । जितना मैं आग्रह करती उतना ही तेज वे चलाते । मैं चिल्ला रही थी, 'भाई धीरे चलाओ ।' अचानक साइकल और हम दोनों गिरे । भाई ने तो अपने पैर धरती पर टिका दिये परन्तु मैं चारों खाने चित्त गिर गई । साइकल किनारे लगा भाई मुझे उठाने आए । मुझे उठाया तो मेरी दाईं हथेली खून से लथपथ थी । भाई ने उसे साफ करने की कोशिश की तो उन्हें बाहर से मेरे हाथ में घुसता कुछ सख्त महसूस हुआ । निकालने लगे तो देखा और चिल्लाए, ‘अरे बट्टा की ये तो कील है !’(अरे बेटा, यह तो कील है ! )

घर आकर माँ ने उसे निकाला । जंग लगी उस कील से कहीं शरीर में जहर ना पहुँचे इसलिए जल्दी से एक जलते कपड़े से मेरा हाथ झुलसाया । एक तो कील घुसने , फिर निकालने की पीड़ा, ऊपर से हाथ झुलसाया जा रहा था । माँ भाई को डाँटते भी जा रही थीं , परन्तु 'छोटी बहना' तब भी यह कहना नहीं भूली ,' माँ, यह हमारा आपसी मामला है ।' चोट को ठीक होने में बहुत लम्बा समय लगा और रोज मुझे हस्पताल जाकर पट्टी करवानी पड़ती थी। पर जैसे ही डॉक्टर पट्टी खोलता और मेरे रोने का समय आता, भाई धीरे से मेरे कान में कहता, ' अरे बट्टा की ये तो कील है !' और मैं मुस्करा देती ।

घुघूती बासूती

Saturday, February 16, 2008

लड़को, जल्दी घर जाओ, आठ बजने वाले हैं !

आज संजीत जी का रायपुर के एक महिला संघ द्वारा १४ फरवरी को अपनी बेटियों को बाहर ना निकलने देने के निर्णय पर लिखा लेख 'बाहर ना निकलें बेटियाँ पर बेटे?' पढ़ा ।

यह लेख पढ़कर बरबस हँसी आ गई । वैसे, पुरुषों व लड़कों से इस हँसी के लिए क्षमा पहले ही माँग लेती हूँ । बराबरी माँगने वालियों को बराबरी देनी भी होती है ।

बात बहुत पुरानी है ,( मैं स्वयं ही काफी पुरानी हूँ !) लगभग १९७० से १९७३ के बीच की । तब भी हम शहर से दूर एक फैक्ट्री की कॉलोनी में रहते थे । यह हरियाणा में आती थी । वैसे मूल निवासियों का लगभग पंजाबी संस्कृति व वातावरण था । यह वह जमाना था जब पुत्र कभी गलत नहीं होते थे, तब भी जब माता पिता अपने पुत्र को किसी लड़की को छेड़ते देखते थे । तब भी जब मारपीट करते थे । हम कॉलोनी में थे तो काफी सीमा तक सुरक्षित थे ।

कंपनी का एक स्पोर्ट्स क्लब था । जिसमें टेबल टैनिस, बैडमिंटन,टैनिस, बिलियर्ड आदि की सुविधाएँ थीं । टेबल टैनिस व बैडमिंटन खेलने की सदस्यता बच्चे भी ले सकते थे । साथ खेलना बहुत कठिन होता था क्योंकि लड़के हमें खेलने नहीं देते थे । इसलिये यह नियम बनाया गया कि सात बजे तक लड़के खेलें व उसके बाद लड़कियाँ व कर्मचारी व उनकी पत्नियाँ ।

उन्हीं दिनों कॉलोनी में लड़कों की शरारतें बढ़ती जा रही थीं । वे शरारतों की सीमाएँ लाँघ कर सबके लिए सिरदर्द बनती जा रही थीं । मैनेजमेंट, कामगार युनियन व सिक्योरिटी वालों की बैठक बुलाई गई और निर्णय लिया गया कि शाम को आठ बजे के बाद कोई भी लड़का अपने घर के बाहर नहीं दिखेगा । ठीक पौने आठ व आठ बजे फैक्टरी का भौंपू बजता था और सब लड़के घरों के अन्दर ! सड़क पर यदि वे दिखे तो उन्हें सजा दी जाएगी । सजा भी कैसी, उट्ठक बैठक या मुर्गा बनाने जैसी । दो तीन लड़कों को सजा मिली और फिर जहाँ आठ बजे सड़कें खाली हो जाती थीं । अब लड़कियाँ, स्त्रियाँ आराम से रात देर तक घूम सकती थीं व हम मजे से खेलकर क्लब से लौटते थे ।

अब सोचती हूँ तो समझती हूँ कि कानून था तो बुरा परन्तु शायद एक बार लड़कों को भी बन्धन क्या होता है अनुभव हुआ होगा । लड़कों व लड़कियों की सारी समस्या का कारण वहाँ का वातावरण था । वहाँ बच्चे साथ पढ़ते थे परन्तु एक दूसरे से बात नहीं कर सकते थे । अब देखती हूँ तो यहाँ साथ पढ़े बच्चे कितनी भी उम्र हो जाने पर एक दूसरे से उसी पुरानी मित्रता से मिलते हैं । यही एक स्वस्थ वातावरण को जन्म देता है ।

घुघूती बासूती

Thursday, February 07, 2008

क्या बुरा है वैलेन्टाइन्स डे मनाने में?

आशा है हर वर्ष की तरह इस वर्ष इस दिन कोई हंगामा नहीं होगा । किन्तु यह आशा करना कुछ अधिक ही आशावादी होना है । मेरी समझ में नहीं आता कि कोई क्या कर रहा है या नहीं कर रहा है, में कुछ लोगों की इतनी रुचि कयों होती है । क्यों नहीं हम जियो और जीने दो में विश्वास कर सकते ? भाई , यदि पसन्द है तो मनाओ, नहीं पसन्द तो मत मनाओ । यदि कोई आपको पकड़ कर जबर्दस्ती नहीं मनवा रहा तो फिर क्या कष्ट है ? इतने सारे दिन हम मनाते हैं, या कहिए न भी पसन्द हों तो भी मनवाए जाते हैं । बाल दिवस है,नारी दिवास है, क दिवस ,ख दिवस ,ग दिवस और ऐसे ही अनेक दिवस ! तो इस प्रेम दिवस में क्या बुराई है ? शायद यही कि इस दिन लोग प्रसन्न चित्त हाथ में गुलाब, कार्ड ,व कभी -कभी उपहार लेकर अपने प्रिय या प्रिया को मिलते हैं । हाथ में चाकू, डंडा ,तलवार या बंदूक लेने से तो यही अधिक अच्छा है ।

हमारे देश में, जहाँ कन्याओं को जन्म लेने से पहले ही, उन पर होने वाले दहेज व विवाह के खर्च से बचने के लिए, मार दिया जाता है, यदि नवयुवक युवतियाँ अपने जीवन साथी का चुनाव स्वयं कर लें तो इस में बुराई क्या है ? आवश्यक नहीं है कि हर मैत्री, प्रेम व आकर्षण विवाह तक पहुँच ही जाएगा । परन्तु ऐसा होने के आसार बढ़ तो बहुत जाएँगे । इससे तो शायद कुछ अजन्मी कन्याओं की जान ही बच जाएगी । माना कि हर प्रेम विवाह सफल नहीं होता, किन्तु हर अभिभावकों द्वारा ठहराया हुआ विवाह कौन सा सफल होता है ? संशय तो दोनों में बना रहता है ।

प्रेम एक नैसेर्गिक भावना है । इसे दबाने का कोई कारण नहीं है । यदि हम बच्चों को बचपन से ही सही मूल्य सिखाएँ तो वे जीवन के सही निर्णय लेने में समर्थ हो जाएँगे । वैसे भी संसार इतनी तेजी से बदल रहा है, उसकी गति को थामा तो नहीं जा सकता । जो एक पीढ़ी को ठीक लगता है
वह उससे पहले की पीढ़ी को आंदोलनकारी लगता था ।

सो बेहतर यही होगा कि हम भी कह दें हैप्पी वैलेन्टाइन्स डे !

घुघूती बासूती

Wednesday, February 06, 2008

छोटी प्रिय बहन रंजना के नाम एक पत्र

मेरी प्यारी छोटी सी बहना रंजना ,

तुम्हारी ये bahin ji ,aap to badi jor se beemaar hain.Aapko manichikitsak ki darkaar hai.और sourri...manochikitsak,pahle waale me mistek ho gaya. टिप्पणियाँ पढ़ीं ।

आप क्या ज्योतिषी हो ? मान गई आपकी पैनी नजर को । सच में, मैं कब से एक मन:चिकित्सक की खोज में हूँ । यदि आपकी जान पहचान में कोई हो तो मेरा केस जल्द से जल्द लेने की सिफारिश करना । आखिर नन्ही मुन्नी बहन किस दिन काम आएगी ? मुसीबत के समय तो पराए भी सहायता के लिए आगे आते हैं । आप तो मेरी बहुत ही अपनी हैं । मेरी कोई छोटी बहन या भाई नहीं था । आपका ‘बहनजी’ सुनकर आँखें भर आती हैं । काश, आप मुझे पहले मिली होतीं ! शायद तब मुझे आपके स्नेह व मार्ग- प्रदर्शन से किसी ‘मन:चिकित्सक’ की आवश्यकता भी न पड़ती । जीवन के बावन वर्ष इस सम्बोधन, स्नेह व मार्ग- प्रदर्शन से वंचित रही । खैर अब क्या किया जा सकता है, जितना जीवन शेष है उसमें अच्छी स्त्री व ‘बहनजी’ बनने की पूरी कोशिश करूँगी । बीच बीच में, जब तब पाँव फिसलेगा तो आशा है आप मेरा पथ- प्रदर्शन करेंगी । हो सकता है जीवन के अन्त तक सुधर ही जाऊँ और ‘करवा चौथ’ आदि व्रत रख पति के पैर छू उनके हाथों से जल ग्रहण कर स्वर्ग का टिकट कटा ही लूँ । वैसे भी मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि यह ना भी हो सका तो आप मेरी भगवान से सिफारिश अवश्य करेंगी ।


अब मैं आपके ‘अद्भुत ज्योतिष’ की बात करना चाहती हूँ । सच में,मैं बड़े जोर से बीमार हूँ । तरह- तरह के डॉक्टरों, वैद्य, होमिओपैथिक वालों से इलाज करवाया । अभी हाल में ही, मेरी दुर्दशा देख पति के एक मित्र 'रेकी मास्टरनी को भी लेकर आये । वे बोलीं कि मुझे नजर लग गई है । अब फुटबॉल से शरीर वाली को देख सींकची पहलवान सी देह वालियों व वालों को जलन तो होगी ही । सोचती हूँ एक काला टीका गाल पर लगाकर ही घर से बाहर निकलूँ । वैसे वे मेरी ‘फोटो’ का इलाज कर रही हैं । कुछ दिन बाद जाकर देखूँगी कि फोटो को कितना स्वास्थ्य लाभ हुआ है । यदि फोटो को लाभ हुआ दिखा तो जो ‘तावीज’ वह मेरे लिये तैयार कर रही हैं उसे काले धागे में अपने गले में लटका लूँगी । तब तो ‘बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला’ हो ही जाएगा ।


अन्यथा, मेरे पास मन:चिकित्सक का विकल्प तो है ही । मेरी समस्या यह है कि हमारे जंगल में इस जाति के प्राणी नहीं रहते । ठीक भी है । आपने क्या कभी मोर, शेर, बाघ, लोमड़ी , सियार, गाय आदि को इनके पास जाते देखा है ? मुझे पता है कि वे क्यों नहीं जाते । इन प्राणियों की मादाओं को अपने- अपने समाज में अपना स्थान पता होता है । वे कभी पुस्तकें पढ़ने, गाय ‘हल में जुतने’ आदि की जिद्द नहीं करतीं । इससे नर व मादा दोनों का स्वास्थ्य, विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य व संतुलन बना रहता है । और एक हम हैं , जिद्दी मूर्ख स्त्रियाँ , हमें हर समय पुरुषों की बराबरी का शौक चढ़ा रहता है । यदि बेटे को ‘मलाई’ मिली तो बेटी को भी चाहिये । जबकि मुझे अपनी बिटिया की ‘छठी कक्षा’ का ‘लड़की’ नामक पाठ याद है । उसमे इतने अच्छे से माँ बिटिया को प्यार से समझाती है ,” कलमूँही, भाई से बराबरी करेगी ? तुझे क्या पढ़कर ‘कलक्टर’ बनना है ? जा दो रोटी रखी हैं, नमक से खा ले । आ मेरे लाल, देख कितनी मलाई है तेरी कटोरी में ! ‘राजा बेटा’ खाएगा नहीं तो बड़ा कैसे होगा ?” शब्दों में थोड़ी गड़बड़ी हो सकती है , आखिर मानसिक रोगी हूँ ,परन्तु भाव ज्यों के त्यों हैं ।


पत्र लम्बा होता जा रहा है । परन्तु क्या करूँ, पहली बार किसी ने सहानुभूति दिखाई व मेरी बीमार नब्ज पकड़ी है । अब मैं अपना बीमारी का छोटा सा लेखा जोखा दे देती हूँ ताकि आप मेरी इस बिगड़ी मानसिक अवस्था को समझ सकेंगी व मुझसे सहानुभूति भी रखेगीं । भविष्य में जब मैं कोई खुराफाती पोस्ट लिखूँगी, तो कारण समझ, प्यार से मुझे समझा सकेंगी । बचपन में पीडियाट्रिसट के पास गई । १५ वर्ष कि आयु में जैनरल फिजिशियन से पाला पड़ा। उन्होंने एपेन्डिसाइटिस बता सर्जन के पास भेज दिया । यहाँ एनेस्थॉलॉजिस्ट से भी पाला पड़ा । १६ वर्ष की आयु में मन:चिकित्सक के पास गई । २० वर्ष में अल्सर से पीड़ित हुई । सो गैस्ट्रोलोगिस्ट के पास जाना पड़ा । २२ वर्ष में साइनस की समस्या आई तो ई एन टी स्पैशिअलिस्ट के पास गई । फिर गाइनेकोलोजिस्ट.. ओबस्टेट्रशियन के पास गई । इस बीच पैथॉलॉजिस्ट के पास भी जाना पड़ा । फिर रैडिओलॉजिस्ट के पास भी गई । ३१ वर्ष में औप्टिसिअन के पास जा चश्मा लगवाया । ३३ की अवस्था में और्थॉपीडिस्ट के पास इलाज चला, जो आज भी चालू है । फिर ३ सर्जरी हुईं जिसमें दो प्लास्टिक सर्जन ने की । मैंने अपनी नाक सुन्दर नहीं बनवाई , इनसिजनल हर्निया के औपरेशन करवाए । ३८ की उम्र में अस्थमा हुआ , जिसका इलाज एलर्जिस्ट ने किया । ४५ की उम्र में र्यूमेटॉलिजिस्ट से इलाज चला । क्या बताऊँ बहना, इतने लम्बे लम्बे बीमारी के नाम थे ! एक बताती हूँ , ‘सैरोनैगेटिव स्पाइनेलो और्थॉपैथी’ ! और एक था सीधा सादा ‘फाइब्रॉमाइल्जिया’ ! आप तो बीमारियों की जानकार हैं अत: इन सब बीमारियों को समझ सकती हैं । मेरे तो सिर के ऊपर से निकल जाता है सब कुछ ! केवल नर्सेज के लिये जो फिजियॉलॉजी व हाईजीन व रोगों की किताब व क्लिनिकल न्यू्ट्रिशन पढ़ा है सो आप जितना तो नहीं जानती । खैर, फिर बारी आई नैफ्रॉलॉजिस्ट की,यूरॉलॉजिस्ट की, न्यूकलियर मेडिसिन की, इम्यूनॉलॉजिस्ट की ! फिर जाइन्टसेल आर्टराइटिस हो गया व वैस्क्यूलाइटिस हो गया सो वैसक्यूलर सर्जन की, फिर एक टुच्चा सा हृदय का वाल्व बैठ गया सो बारी आई कार्डियॉलॉजिस्ट की । फिर न्यूरॉलॉजिस्ट की । अभी भी मैडिसिन के कुछ क्षेत्र बच गए हैं सो सोचती हूँ कि मन:चिकित्सक के साथ साथ बाकी बचे डॉक्टर्स से भी इलाज करवा ही लिया जाए । किसी को भी छोड़ना अन्याय होगा । शनिवार को २०० कि मी दूर राजकोट जाकर दिखाकर आई हूँ । वे दिल्ली के AIMS में भर्ती होकर कुछ टेस्ट करवाने को कह रहे हैं । आज अपने कार्डियॉलॉजिस्ट से मिलकर आई । उन्होंने डीप वेन थ्रॉम्बॉसिस के लिए कलर
डॉपलर टेस्ट करवाया । तब तक आपकी टिप्पणी नहीं पढ़ी थी, अन्यथा उनसे किसी दूर दराज के शहर के मन:चिकित्सक से भी बात करने को कहती । खैर , मेरी बहना, आप तो हैं ही सो मुझे चिन्ता नहीं । कहीं ना कहीं तो इलाज करवा ही दोगी । यदि घुघूता जी खर्चा देने को मना करें तो आप तो हैं ही ।

पत्र लम्बा हो गया है , परन्तु आप ही मुझे इस अन्धी गली में उजाले की किरण नजर आई हो। अब तो जब भी कुछ होगा आपके ज्योतिष का भरोसा कर इलाज करवा लूँगी ।


हाँ ! एक बात और ! आपने वह ‘तारे जमीन पर’ या कुछ ऐसे ही नाम की फिल्म देखी है क्या ? उसमें जो ‘डिसलैक्सिस’ बच्चा था, वह आपसे कम बीमार रहा होगा । आपने क्या कभी अपनी वर्तनी.. स्पैलिंग्स पर ध्यान दिया है ? हो सके तो आमिर खान से अपने इलाज के बारे में भी पूछ लेना बहना ! मेरी बहन इतनी गलत भाषा लिखे तो मेरा सिर शर्म से झुक जाता है । यदि कोई इलाज ना हो सके तो लिखना छोड़कर पॉडकास्ट कर लिया करना । क्या कहा ? उच्चारण की भी समस्या है ? ओह ! मेरे तो हाथ काँपते हैं, तो टाइप करने में गलती हो जाती है । जबान लड़खड़ाती है तो बोलने में गलती हो जाती है । परन्तु मेरी तो अब उम्र हो चली, परन्तु छोटी, तुम्हें तो ये समस्याएँ नहीं होनी चाहियें ।


बहुत बहुत स्नेह सहित,
बड़ी बहनजी ( घुघूती बासूती )

Tuesday, February 05, 2008

नोटपैड बहना ,क्यों डराती हो इतना ?

 

 

नोटपैड बहना ,
क्यों डराती हो इतना ?
चलो मिल बनाए गुझिया,
जिसे देख सीखे अपनी गुड़िया,
चलो लगाएँ उसे भी रसोई में
क्या धरा है उसकी पढ़ाई में ?
पढ़ना ही है तो कितना है पढ़ने को-
पढ़ो ‘गृहशोभा’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘मेरी सहेली’ ,
संपादिका हैं जिनकी कोई फिल्म स्टार
ये सिखाती हैं तरीके पति को रिझाने के,
बैंगन का नये तरीके का भर्ता बनाने के
मुन्ने को मालिश कर सुलाने के, ( मुन्नी को नहीं )
तरीके है पार्टी में मेकअप लगाने के,
बच्चों को बहलाने के,
रूठे पति को मनाने के,
छोड़ो ये पाब्लो- फाब्लो को ,
चलो पड़ोस हल्दी- कुमकुम को,
पर ना लाना विधवा सखी को
कर देगी वह अशुभ ,शुभ को ।
चलो मेरी बहना
काम है कितना !

- घुघूती बासूती

Monday, February 04, 2008

मेरी सखी

तुमसे मिलकर मुझे ऐसा लगा
जैसे पिछले ये तीस वर्ष
एक मरुस्थल से,रेतीले, कंटीले,
गर्म हवाओं के धूल भरे गुबार से
हमारे बीचोंबीच खिंच गए हैं ।


तुम उस पार खड़ी थीं
और मैं इस पार,
हमारे बीच रबर बैंड सा खिंचा
इतने वर्षों का अनजानापन ।


जब इस तने रबर बैंड को
जिसने बाँध भी रखा था
और तीस वर्षों की
निस्शब्द दूरी को
धुंध सा हमारे बीच
तान भी रखा था ।


मैंने खोलने की चेष्टा की तो
वह खुला और मेरे हृदय पर
चटाक एक थप्पड़ सा वार कर
वापिस अपने स्थान पर तन गया ।


इससे पहले कि मैं तुम्हारे चेहरे पर लिखे
दर्द की भाषा को पढ़ पाती
मेरा हृदय रक्तरंजित हो चुका था ।


अपने बीच पसरे इस कुँहासे को चीरकर
जब मैंने तुम्हें देखने की चेष्टा की
तो ऐसा लगा कि मुस्कराने के प्रयास में
एक टीस बादल बन हमें लपेट रही है ।
यह बादल यदि बरसता तो
क्या जल की बूँदे बन बरसता ?
या इस बादल से तेजाब की बूँदें बरसती ?


मैं कुछ सहमी, कुछ सकुचाई ,
इन बूँदों से अपनी आत्मा को भिगोने को आतुर
खड़ी रही, प्रतीक्षा में खड़ी रही ,
पर वह बादल न जल संचित था न तेजाब ।


वह बादल तो एक खामोशी , एक उदासी
या शायद जीवन की कड़ुवाहट को
वर्षों तक खौलाकर तैयार किए
एक अनजाने तत्व से बना धूँआ भर था।


ना वह पिघला, ना मैं भीगी,
ना भीगा मेरा प्यासा मन ।
कोरी सी रह गई मेरी आत्मा
अतृप्त सी रह गई मेरी तृष्णा ।


कहाँ गया सखी वह स्नेह का अमृत
जो केवल तुम और मैं पीते थे ,
कहाँ गई वह संकेतों की भाषा
जो केवल तुम और मैं समझते थे ?


वह किशोरावस्था का साथ
वह हँसी व खिलखिलाहट,
दिन भर की हर परिचर्या का
मिलकर दिया हिसाब किताब ।


जब जीवन को प्यार ने पहली बार छुआ था
जब अपने अपने प्यार को हमने मिलकर साथ जिया था
जब जीवन का हर विष हर अमृत हमने साथ पिया था
हर अनुभूति को जब शब्दों में दोहराकर एक बार फिर जिया था
अपनी राह के हर काँटे व पुष्प को जब हमने साथ छुआ था ।


जब लगता था कि जीवन की हर राह में
सखी हम साथ चलेंगे ,
जब यूँ लगता था जीवन के हर मोड़ में
सखी हम साथ रहेंगे ।


कितने आँसू इक दूजे के हमने पोंछे
कितने घावों को सहलाया था ,
कितने राज इक दूजे के हमने जाने
कितनी बातों ने हमें गुदगुदाया था ।


उन्हीं बीते क्षणों को फिर से जीने
तुम्हारी मन आत्मा को फिर से छूने
सखी इतनी दूर से मैं आई थी
बीते वर्षों से संजोया स्नेह
देने मैं तुम्हें आई थी ।


कितना कुछ सुनने को था
कितना कुछ सुनाने को
इस बार सोचा था सखी
मिलकर सपने ना हम देखेंगे,
इक दूजे के टूटे सपनों के
सोचा था, मिलकर काँच बटोरेंगे ।


पर बन्द सीप सी,
अपनी आँखों से निकले
हर मोती को
तुम अपने में ही समेटे थीं
यूँ लगता था सीप को खोलूँ
तो आँसू की न बाढ़ आएगी
न धो पाएँगे उसमें हम अपना मन
अपितु हिमखण्ड से जमे ये आँसू
हिम मानव सा हमें जमा जाएँगे ।


तभी तो सीप सी बंद तुमसे मैं मिली
सीप सी बंद तुम्हें मैं छोड़ आई ,
वापिस अपने संग यादों का
ये बंद पिटारा ले आई ।


कई बार यत्न किया था खोलूँ अपने उस बंद पिटारे को
किन्तु देख दर्द से भीगी उन आँखों को
मैं खेलती रही ताले से यादों के उस पिटारे के
कितनी बार चाभी तुम्हें देनी चाही
पर हिम आँसू संजोई तुम्हारी वे आँखें
देख न पाईं मुट्ठी में बंद चाभी ।


अब सखी वापिस जा रही हूँ
भाग रही ये ट्रेन है
उससे भी अधिक तेज
यादों की ये आँधियां हैं
चल रही मेरे मस्तिष्क में ।


पटरियों से समानान्तर
चल रहे हमारे ये जीवन क्या
अब कभी न मिल पाएँगे ,
जब कभी अवसर लगेगा
झाँकने इक दूजे के हृदय मे
हम सखी अवश्य आएँगे ।


घुघूती बासूती