Friday, November 23, 2007

पतझड़




कल सपने में पतझड़ आया था
साथ अपने सुनहरी पत्ते लाया था
मैं खड़ी थी इक वृक्ष के नीचे
आ रहे थे पवन के झोंके
हर झोंका लाता था उड़ते पत्ते
उड़ते, बहते साथ पवन के
धीमे धीमे नीचे को आते
पीले, भूरे, कुछ लाली वाले
सुन्दर प्यारी धरती पर आते
कुछ मेरे बालों में फंसे पड़े थे
कुछ गालों को सहला जाते
नीचे पत्तों का कालीन बिछा था
उनपर जब पाँव मेरा पड़ता था
भुरभुराते से वे भूरे सूखे पत्ते
पैरों को सहलाते झुरझुरी फैलाते।


मैं ऊपर डालों को अतीत
अपना झाड़ते देख रही थी
ना वृक्षों के आँसू निकले
ना चीख किसी पत्ते की आई
ना थे वहाँ विदाई के आँसू
चुपके से इक पत्ता था
छोड़ रहा जीवन का बन्धन
मुक्त हवा में वह उड़ता था
जैसे हाथ हिला कर मुस्काता
अपने जीवन स्रोत को विदा कहता
जा रहा था वह धरती से मिलने
जानता हो जैसे हर पत्ता
नवजीवन को लाने को
प्रकृति की छटा बढ़ाने को
इक दिन सबको जाना होगा ।



मैं वृक्षों की पंक्ति के नीचे
मंत्रमुग्ध सी चलती जाती
शायद सारी रात चली थी
भोर की जब किरणे आईं
जब देखा मैंने मुड़कर तो
सफेद, गुलाबी और नारंगी
फूल खिले थे हर डाली पर
देख अपने ही सौन्दर्य को
जैसे सब वृक्ष मुग्ध हुए थे।


जाना तब मैंने भी जीवन का सार
जब आता है विदा लेने का काल
ना रिरियाना, ना घबराना
हल्के से सब बंधन प्राणों के तोड़
इक पत्ते सा धीरे धीरे से धरती पर गिरना
ना पकड़े रहना जीवन की छूटी जाती डोर
ना आँसू ना मातम करना
नव जीवन तब ही आएगा
थका पुराना जीवन जब जाएगा ।


घुघूती बासूती

Thursday, November 22, 2007

अम्मा १

अम्मा विषय के अन्तर्गत मैं कुछ माताओं के विषय में बताऊँगी जिनसे मैं बहुत प्रभावित हुई ।
आज की माँ को मैं अम्मा १ का शीर्षक दे रही हूँ ।
मुझे दिल्ली से एक महत्वपूर्ण काम से अपनी पुत्री के साथ उत्तर प्रदेश के एक बहुत पुराने शहर जाना
था । विवाह के बाद से कहीं भी अकेले जाना छूट गया था । जब एक जगह से दूसरी जगह बदली होती तो पति व बच्चों के साथ जाती थी । किसी आस पास के शहर जाना होता तो ड्राइवर के साथ कार में जाती । यदि रूकना पड़ता तो कम्पनी के गेस्ट हाउस में रुकती । यह विश्वास नहीं होता था कि ये वही मैं हूँ जो हॉस्टेल से घर आने के लिए स्वयं टिकट लेने जाती थी । फिर एक दूसरे शहर तक बस से जाकर ट्रेन पकड़ लगभग दो दिन की यात्रा कर घर पहुँचती थी। मैं देख सकती थी कि सुख सुविधाएँ मनुष्य को किस सीमा तक नरम व भीरू बना सकती थीं ।
अब समस्या यह थी की हम रहेंगे कहाँ। अनजाना शहर, कोई जान पहचान नहीं जो ये भी बता सके कि किस होटेल में ठहरा जा सकता था । तभी पता चला की पति की तरफ के एक दूर के रिश्तेदार, या कहिये, कि रिश्तेदार के रिश्तेदार उस शहर में रहते हैं । उनसे बातचीत कर मुझे बताया गया कि हम उनके घर ठहर सकते हैं । मैं लगभग पच्चीस वर्ष के वैवाहिक जीवन में पति के सगे भाइयों व बहन के परिवार के सिवाय लगभग किसी रिश्तेदार से नहीं मिली थी ।
बहुत विचित्र सा लग रहा था कि ऐसे किसी के घर कैसे टपका जा सकता है । ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ सी स्थिति थी । अपनी झिझक को दूर करने के लिए मैंने दो बार उनसे फोन पर बात की । ऐसा लगा कि अनजान लोगों की यह मेहमान नवाजी उनके लिए कोई नई बात नहीं थी । सो थोड़ी सी हिम्मत जुटी ।
खैर, कुछ उपहार ले हम यात्रा पर चल पड़े । स्टेशन से किसी तरह से हमने एक रिक्शा किया और आसानी से अपने गन्तव्य पहुँच गए। वहाँ पर सब हमसे इस तरह मिले मानो वे हमें पहले से जानते हों । उनकी वृद्ध माँ भी हमें बहुत प्यार से मिलीं । अभी हम अपने काम से जाने को तैयार ही हो रहे थे कि पता चला कि आज नगर बंद की घोषणा हो गई है। मेरे अनुमान से बंद का अर्थ था घर में ही चुपचाप बैठे रहना । किन्तु अम्मा बोली कि अरे कुछ नहीं होगा, बिटवा को साथ ले जाओ ।
वापिस घर पहुँचे तो उनकी पत्नी बारह लोगों के लिए अकेले भोजन बना रहीं थीं । सबका दाल सब्जी बनाने का ढंग तो अलग हो सकता है किन्तु रोटी पराँठे तो एक से रहते हैं । सो इसका जिम्मा अपने ऊपर ले हम साथ-साथ काम करने लगे । बीच-बीच में अम्मा से भी बातें होती रहीं । भोजन समाप्त कर कुछ देर सब आराम कर रहे थे । एक घंटे बाद जब सब एकत्र हुए तो अम्मा मुझे, घर की ४५ वर्षीय बहू, अपनी बेटी सबको कुछ ना कुछ काम थमा रही थीं । किसी को चावल बीनने में लगा दिया तो किसी को हरी सब्जी चुनने व काटने में, तो किसी को चटनी बनाने में । स्वयं पुराना ऊन सुलझाने बैठ गईं । मुझे यह स्थिति कुछ अजीब सी लगी ।
बहुत पुराना चौमंजिला पुश्तैनी घर था । नीचे दो संडास, दो स्नानागार, एक बैठक और एक सोने का कमरा । दूसरी मंजिल में रसोई, एक बड़ी बैठक और एक सोने का कमरा । तीसरी मंजिल में बेटे बहू का कमरा, बच्चों का कमरा और एक विराट स्नानागार, जिसमें अलमारियाँ तक थीं और पंखा भी । परन्तु यहाँ कमोड नहीं था । मैं आश्चर्यचकित कि क्या दो मंजिल उतर कर नीचे जाते होंगे । बहू बोलीं चुपचाप से यहाँ ही बने एक विचित्र कमोड, जिसे कहीं से भी कमोड नहीं कहा जा सकता था, का उपयोग करो । नीचे गईं तो फिर हर बार स्नान करना होगा । मैंने पूछा कि यहाँ क्यों नहीं बनवाया तो बोली अम्मा ने मना किया है सो कुछ ऐसा प्रबंध किया कि उन्हें पता भी न चले और काम भी चल जाए । लोगों के बारे में निर्णय लेना तो हम सब अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं । मैं समझ नहीं पा रही थी कि इतना अपनापन देने वाली अम्मा को किस श्रेणी में रखूँ ।
ऐसे ही तीन दिन बीत गए, कभी रसोई से बहू को बाहर निकलते देखा ही नहीं । हमारा भी काम हो गया था सो निकलने से पहले अम्मा को प्रणाम किया । वे बोलीं अपना आँचल फैलाओ। हमने वैसा ही किया । तो उसमें एक सूप से नारियल , चावल, गुड़, साड़ी व कुछ रूपये उन्होंने रख दिये । हम अम्मा यह सब क्या है कहते ही रह गए तो वे बोलीं कि घर से बेटी को ऐसे ही विदा किया जाता है ।
आज तक समझ नहीं पाती हूँ कि असली अम्मा कौन सी थीं, वे जो अपनी बहू, बेटी को पल भर भी खाली नहीं बैठने देती थीं, उच्च रक्तचाप वाली बहू से आशा करती थीं कि वे दो मंजिलें उतर कर बाथरूम जाएँ, फिर हर बार नहाएँ , या मुझे इतने प्यार से विदा करने वाली अम्मा ?
किन्तु जो भी हो मुझे जब भी अम्मा व उनके परिवार की याद आती है मन आत्मीयता से भर जाता है ।
घुघूती बासूती

Wednesday, November 21, 2007

जब मैं लड़का देखने गई ।

जब मैंने लड़के को देखा व स्वयं को उसे दिखाया !
रवीश जी ने एक चिट्ठे में लड़की की दिखाई में लड़कों द्वारा लड़कियों को विवाह के लिए देखने के विषय में लिखा है । बचपन से ही मुझे यह प्रक्रिया बहुत ही विचित्र व कुछ अपमानजनक लगती रही है । क्यों, कह नहीं सकती । शायद कारण यह रहा हो कि मुझे प्रेम के अतिरिक्त विवाह करने का कोई भी कारण जंचा नहीं । मैं गलत भी हो सकती हूँ, क्योंकि आज मैं प्रेम में हारे हुए अपने मित्रों को वैवाहिक साइट्स पर जाकर किसी सही व्यक्ति से मिलने की सलाह देती ही रहती हूँ । कारण यह भी है कि जो इन साइट्स पर अपने नाम, फोटो आदि देते हैं वे विवाह करने के विषय में में वाकई संजीदें होंगे अन्यथा इतना कष्ट क्यों करते। सो उनसे कहती हूँ कि उनसे मिलो , उन्हें जानो व हो सकता आप एक दूसरे को चाहने लगेंगे ।
खैर, मैं तो आपको इस विषय से सम्बन्धित एक किस्सा सुनाना चाहती हूँ जो मुझे रवीश जी का चिट्ठा पढ़ याद आ गया ।
बात यूँ हुई कि मैं हॉस्टल से अपने घर गई थी । बातों ही बातों में मुझे बताया गया कि अमुक परिवार, उन्हें अ ब स कह सकते हें, अपने बेटे का विवाह मुझसे करना चाहते हैं व बेटे के साथ मुझे देखना चाहते हैं । मुझसे पूछा कि क्या बात आगे बढ़ाएँ । उस शहर में हमारे समाज के कुछ ही घर थे व उन्हें मेरे विषय में पता चला था, या शायद उन्होंने मुझे देखा भी हो । बचपन से ही मैं बहुत ही बिन्दास व मजाकिया प्रवृत्ति की थी, किन्तु कुछ विषयों में बहुत ही संजीदी भी थी जैसे कि लड़के वालों द्वारा लड़की को देखने के विषय में, स्त्रियों के अधिकारों के विषय में आदि । मैंने माँ से उनके बारे में पूछा । जहाँ वे रहते थे, उसी इलाके में हमारे जान पहचान के, हमारे छोटे से समाज का एक और परिवार भी रहता था, जिनसे हमारी कुछ रिश्तेदारी निकलती थी व जो हमारे घर आते जाते थे।
सो मैं अपनी जान पहचान वालों के घर के लिए चल पड़ी । वहाँ पहुँचकर मैंने कहा कि अ ब स भी तो यहीं रहते हैं । वे बोले हाँ । मैंने कहा उनसे भी मिल लिया जाए । सो हम उनके घर चले गए । रिश्तेदार मुझे वहाँ पहुँचा कर अपने घर वापिस चले गए । मैंने अपना परिचय दिया कि मैं क ख ग ज्यू की बेटी हूँ । बेचारा लड़का बनियान पहने हुए बैठक में बैठा हुआ था । न उससे उठते बनता था न बैठते । वह इन्जीनियर था । मैं उससे कहाँ पढ़ा है, किस ब्रान्च में इन्जीनियरिंग की है , वह अपने भविष्य के विषय में क्या सोचता है आदि पूछती रही । साहित्य में उसकी क्या रुचि है , यदि हाँ तो कौन पसन्द हैं । ऍन रैन्ड को पढ़ा है , उसके किन उपन्यासों से वह प्रभावित हुआ है आदि बातें करती रही । कौन से खेल में उसकी रुचि है व अपना प्रिय खेल जिसमें मैं छोटी मोटी चैम्पियन थी के बारे में बताया। घर से जब दूर रहे तो क्या घर का कुछ काम काज जैसे बेसिक खाना बनाना सीखा या नहीं । पहाड़ के लड़कों को तो कुछ खाना बनाना आता है जैसे मेरे पिताजी को, आदि पूछती रही । उसके व उसके माता पिता का चेहरा देखते ही बनता था । मैं प्रतीक्षा कर रही थी कि कब वह चाय लेकर आयेगा । मैं चाय तो पीती नहीं थी, सो उसके पूछने पर मुझे मना करना पड़ा । आधे घंटे उनके घर बैठ मैं वापिस घर आ गई । वह कमीज पहन मुझे रिक्शा स्टेंड तक छोड़ने आया। शायद उसने ऐसी लड़की पहले नहीं देखी थी, ना ही कल्पना की थी । वह मुझसे बोला कि आप तो बहुत बोल्ड हो ।
माँ से बोला निश्चिन्त रहो अब वे आपसे मेरे बारे में बात नहीं करेंगे । मैं स्वयं अपने को उन्हें दिखा आई हूँ व उनके सपूत को भी देख आई हूँ । आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब इस सबके बावजूद वे लोग बात आगे बढ़ाने को हमारे घर आ गए । मैं तो वापिस हॉस्टेल चली आई थी । माता पिता ने कहा कि अभी तो मैं पढ़ रही हूँ, अभी विवाह के विषय में नहीं सोचा आदि । शायद माँ को तब भी मेरे मन के बारे में अनुमान था कि मैं ऐसा तय किया विवाह नहीं करूँगी ।
सो मैं भी एक बार अपने को लड़के को दिखा आई व लड़के को देख आई । शायद वह लड़का किसी लड़की को देखने से पहले चार बार सोच अवश्य लेता होगा । आज न तो मुझे उसका नाम याद है न उसकी शक्ल और यदि रवीश जी का चिट्ठा न पढ़ती तो इस बात की याद भी न आती ।
घुघूती बासूती

Monday, November 19, 2007

ओस की एक बूँद


ओस की एक बूँद हूँ मैं
सुबह आएगी तो खो जाऊँगी मैं,
धरती की आँख से निकली एक बूँद हूँ मैं
जब सूरज धरा को चूमेगा तो खो जाऊँगी मैं ।

तेरे हृदय से निकली एक आह हूँ मैं
जब तू सो जाएगा तो खो जाऊँगी मैं,
तेरे स्वप्न का एक भाग हूँ मैं
जब तू जागेगा तो खो जाऊँगी मैं ।

तेरे आँगन के फूल की एक पंखुड़ी हूँ मैं
जब हवा चलेगी तो उड़ जाऊँगी मैं,
तेरे बगीचे के पेड़ की एक पीली पाती हूँ मैं
जब पतझड़ आएगा तो उड़ जाऊँगी मैं ।

दूर पहाड़ी पर गिरी एक हिमकणिका हूँ मैं
वसन्त आएगा तो पिघल जाऊँगी मैं,
तेरे हाथ में एक मोम की पुतली हूँ मैं
तेरी साँसों की गर्मी से पिघल जाऊँगी मैं ।

इस धरती पर किसी के प्यार की छाया हूँ मैं
प्यार न होगा तो नज़र न आऊँगी मैं,
किसी के दर्द का मीठा सा एहसास हूँ मैं
दर्द न होगा तो नज़र न आऊँगी मैं ।

तेरे दिल की धड़कन की एक गूँज हूँ मैं
जब दिल न धड़केगा मेरे लिये, चली जाऊँगी मैं,
तेरे मन की यादों की एक मौज हूँ मैं
जब तू भुला देगा चली जाऊँगी मैं ।

तेरी साँसों की महकती खुशबू हूँ मैं
जब तू कहेगा चली जाऊँगी मैं,
तेरे हाथों की एक रेखा हूँ मैं
जब तू मिटा देगा तो मिट जाऊँगी मैं ।

घुघूती बासूती

Thursday, November 15, 2007

वह तो केवल एक है

वह केवल एक है
चाहता अनेक है
यहाँ भी होऊँ
वहाँ भी होऊँ
किसको पाऊँ
किसको खोऊँ
प्रश्न ये अनेक हैं
और वह एक है ।


मन का सारा खेल है
कि वह तो एक है
सबसे उसका मेल है
किन्तु वह एक है ।


वह तो केवल एक है
सबसे उसको प्रेम है
इसका भी रखना ध्यान है
उसका भी रखना ध्यान है
किसको छोड़ूँ
किसको पकड़ूँ
द्वंद ये अनेक हैं
और वह एक है ।


बात ये अजब है
कि वह तो एक है
चाहता वह गजब है
किन्तु वह एक है ।


घुघूती बासूती

Tuesday, November 13, 2007

जंगल में मंगल

एक दीपावली ऐसी भी ।

छोटी सी जगह,थोड़े से लोग । अधिकतर अपने परिवार, प्रांत से बहुत दूर । एक स्कूल, एक दुकान, एक धोबी, एक क्लब, एक महिला मंडल और एक फैक्टरी । और सबके लिए एक सा शहर से बहुत दूर का जीवन ! ऐसे में यदि हम मिलकर कुछ नया कर अपना मन ना बहलाएँ तो घुट जाएँगे । यही सब सोचकर हमने इस वर्ष कुछ नया करने की सोची। और यह नया दीपावली और नव वर्ष के शुभ अवसर पर आरम्भ किया ।
दीपावली के साथ बहुत से मुद्दे जुड़ने लगे हैं जो पहले लगभग सोचे भी नहीं जाते थे । प्रदूषण के विषय में हम सोचते भी न थे । पशुओं, बीमार और वृद्धों को आवाज से होती तकलीफ का भी हमें ध्यान न आता था । इन सबकी ओर हमारा ध्यान हमारे बच्चों व नई पीढ़ी ने ही खींचा । तब हमने भी खूब उत्साह परन्तु कम प्रदूषण वाली दीपावली मनाने का निर्णय किया ।
हम लोग प्रत्येक वर्ष अपने औफिस में लक्ष्मी पूजन करते हैं ,जहाँ सभी निमन्त्रित होते हैं । पूजा समाप्ति पर प्रसाद व फिर पटाखे व आतिशबाजी चलाई जाती है । इसके बाद सब अपने अपने घर आकर लक्ष्मी पूजन करते हैं व दीये जलाते हैं । फिर मिलना मिलाना शुरू होता है । लोग एक दूसरे के घर जाते हैं मिठाई आदि खाते है् व मेजबान को भी अपने साथ लेकर बढ़ जाते हैं । अन्त में सब हमारे घर पहुँचते हैं । अन्त में सब हमारे घर पहुँचते
हैं, यहाँ भी साथ मिलकर खाया पिया जाता है व सब मिलकर पटाखे व आतिशबाजी चलाते हैं । इसमें केवल १६ या १८ अड़ोस पड़ोस के परिवार ही सम्मिलित हो पाते हैं ।

अगले दिन गुजराती नव वर्ष होता है । सो सबका मिलना आवश्यक होता है । इस वर्ष हम मंदिर में मिले। सबने पहले भगवान को प्रणाम किया व फिर एक दूसरे के गले मिल साल मुबारक कहा । बैठे और कुछ गप्प की और फिर प्रसाद खाया । हमारी कॉलोनी में लगभग १५०, १६० मकान हैं सो उतने ही परिवार। सभी एक ही जगह काम करते हैं । सबके सुख दुख एक जैसे ही हैं । हम सब लगभग एक दूसरे को जानते हैं । सभी बच्चों को अपना सा मानते हैं । सो इस बार हमने सोचा क्यों न नव वर्ष की संध्या भी इकट्ठे मनाई जाए ।
दिन भर लोग मुबारकवाद देने आते रहे । स्कूल के बच्चे भी आते रहे । प्रणाम कर आशीर्वाद लेते रहे ।
सो अकेलापन अधिक नहीं खला क्योंकि ये भी अपने ही बच्चे थे । कुछ छोटे बच्चों से तो खूब लाड़ लड़ाया । बच्चों को खिलाने का भी आनन्द लिया ।
शंध्या को ८ बजे से क्लब का कार्यक्रम आरम्भ हो गया । वही, सबसे मिलना और जिनसे सुबह नहीं मिले थे उनसे गले मिलना । उसके बाद तम्बोला रखा गया था । हमारे यहाँ बच्चे भी न जाने क्यों तम्बोला बहुत पसन्द करते हैं । केवल ५ रुपये का टिकट और उनका उत्साह देखते ही बनता है । यदि २५ नम्बर पुकारा गया तो कोई बच्चा बोलेगा, उससे केवल २ अधिक या ५ कम । ना किसी बच्चे को टोका जाता है न चुप रहने को कहा जाता है। बिल्कुल छोटे बच्चे तितलियों से यहाँ वहाँ मंडराते रहते हैं । कभी इस आंटी की गोद में तो कभी उस अंकल की । हर कोई उन्हें लाड़ करता है । यदि आप शाला की अध्यापिका हो या वहाँ पढ़ा चुकी हो तब तो हर बच्चा आपसे मिलने जरूर आयेगा । तम्बोला समाप्त होने पर आतिशबाजी व पटाखों का कार्यक्रम था । रस्सियाँ बाँधकर मैदान का एक हिस्सा अलग कर दिया गया था जहाँ किसी को भी जाने की अनुमति न थी ।
आतिशबाजियाँ तो देखते ही बनती थीं । रंग बिरंगी आकाश में जाकर छिटकने वाली, आवाज वाली, सतरंगी रंगों वाली । हम मोहित से उन्हें देखते ही रह गए । सब मंत्रमुग्ध थे । अपने अपने बलबूते पर इतना खर्चा करना हम में से किसी के वश का न था । किन्तु यदि १५० परिवार मिलकर खुशी मना रहे थे तो कम्पनी के लिए यह कठिन न था । और जब मैं प्रदूषण के बारे में सोचती हूँ तो प्रति व्यक्ति एक आतिशबाजी भी न रही होगी । खर्चे के हिसाब से भी शायद अलग अलग मनाने से कम ही रहा होगा । और खुशी ! सामूहिक रूप से मनाने से वह तो १५०गुना हो गयी थी ।
नवरात्रियों में हम सब मिलकर गर्बा भी करते हैं । उन दिनों के भी बहुत सारे विडीयो बना रखे थे । अब वे ही एक बड़े परदे पर दिखाए जा रहे थे । बच्चे स्वयं को परदे पर देख खूब खुश हो रहे थे । फिर बच्चों व छोटे बच्चों कि माँओ को खाने के लिए बुलाया गया । फिर अन्य स्त्रियों को और पुरुषों को । गरम गरम पूरी , स्वादिष्ट ऊँधिया , कढ़ी व भात , सलाद, पापड़, अचार और वासुन्दी सबके साथ मिलकर खाने में जो मजा आया वह किसी बड़े होटल में भी नहीं आ सकता ।
हँसी मजाक करते व खुशी खुशी हमने इस वर्ष की दीपावली व उसके साथ आने वाले त्यौहारों को विदा किया व नववर्ष में कदम रखा । कल हमारे महिला मंडल में नववर्ष मनाया जाएगा। सुन्दर सुन्दर रंगोली बनेंगी । खूब सजाया जाएगा मंडल को । बच्चे भाग दौड़ करेंगे । एक बार फिर उल्लास का वातावरण होगा । आशा है, यूँ ही मिलकर खुशी खुशी यह नया वर्ष भी बीत जाएगा । और हाँ, अभी तो हमें ३१ दिसम्बर को भी नृत्य व संगीत के बीच एक और नया वर्ष मनाना है ।
शायद इसी को जंगल में मंगल कहते हैं ।
घुघूती बासूती

Thursday, November 08, 2007

दड़बों की कीमत

जब भी शहर आती हूँ
किसी दड़बे में खुद को पाती हूँ
इन शहरी दड़बों में मुर्गियाँ नहीं
मनुष्य पाये जाते हैं ।
दौड़ते भागते कारों,बसों
से खुद को बचाते
पर्स व जेब सम्भालते
गहनों को बैंक के लॉकर में छिपाते
चोरों जेबकतरों से बचते बचाते ।
जब यह खिड़की पर
या कोई अधिक भाग्यवान
किसी बालकनी पर टंगकर
संसार को निहारता है
तो क्या देख रहा है जानने की
उत्सुकता मेरे अंदर जागती है ।
मैं भी खिड़की से लटक
बाहर का संसार जो घर के अंदर
सुना जा सकता है, देखती हूँ
पर मुझे कुछ विशेष
नजर नहीं आता ,
कहीं सड़क पर क्रिकेट खेलते बच्चे
कहीं कोई मरियल सा पेड़
यदि अच्छी दड़बा समिति हुई तो
उखड़ी घास का एक टुकड़ा मैदान
कोई कमजोर सा मरियल कुत्ता ।
ऊपर को ताको तो
छोटा सा आकाश का टुकड़ा
सामने की बालकनी पर
सूखते हुए गीले कपड़े
गुटरगूँ करते कबूतर
यदि परदे हटे हों तो
किसी घर का अन्दर का जीवन ।
इतने बड़े संसार में
एक परिवार को यदि हजार
वर्ग फुट जमीन नहीं,
फर्श मिल जाए तो
मानो वह सफल है
उसका जीवन सफल है ।
अधर में लटकता
उसका यह दड़बा उसे
कितना अधिक प्यारा है
बहुत सारी कीमत है
इसकी उसने चुकाई
और लगभग सारा जीवन
उसे चुकाते जानी है ।
घंटो सफर कर जब वह
घर आता है थका, झल्लाया
तो कुछ खाना बना, खा
कान पर मोबाइल
हाथ में टी.वी रिमोट
इस सारे झमेले के
ईनाम में वह पाता है ।
इन दोनों को वह
देर रात तक भुनाता है
दस हाथ की दूरी से करता
है वह जीवन का दर्शन
साथ जीवन जीने वालों से
उसे कम ही है मतलब
उसका जीवन तो कैद है
इक्कीस इंची परदे पर ।
यहीं जीता है वह प्रेम प्रसंग
बर्फीली पहाड़ियाँ,पेड़, पक्षी, जानवर
रेतीली मरूस्थल, सागर की लहरें ।
कैसे दो प्राणी मिलकर
ताक सकते हैं इस जादुई डब्बे को
क्यों उनकी उँगलियाँ नहीं
ढूँढती इक दूजे को
क्यों नहीं मिलकर बनाते
अपना इक रंगी संसार
क्यों देखते हैं दूजों के
जीवन के नकली एपीसोड।
जब उनके खुद के जीवन
बिल्कुल ही खाली होते जाते
शायद स्वयं का जीवन जीने
में है लगती उर्जा , चाहत व
विवाद भी हैं सहने पड़ते ।
इन सबसे बचकर रहता है
अपना ये दड़बे वाला, जीवंत
भावनाओं से भागा फिरता है ।

घुघूती बासूती

Wednesday, November 07, 2007

सौराष्ट्र में भूकम्प के झटके

कल ६ नवम्बर को सौराष्ट्र में भूकम्प, जिसे गुजराती में धरतीकम्प कहते हैं, आया । सुबह ५ बजकर ५८ मिनट पर और फिर दोपहर ३ बजकर ८ मिनट पर रीटर स्केल पर ५.१ के ये झटके हमारे इलाके में भी महसूस किये गये । भूकम्प का केन्द्र जूनागढ़ जिले के तलाला तालुके के खखरावाडा गाँव में था । तलाला में एक व्यक्ति की मृत्यु हुई, ५० मकानों को हानि पहुँची व बहुत से मकानों में दरारे पड़ गयीं । जूनागढ़ में भी कुछ मकानों को क्षति पहुँची । कल दिन भर २० छोटे झटके भी आए ।
सौराष्ट्र के लिए प्राकृतिक आपदाएँ कोई नई चीज नहीं हैं । २००१ के भूकम्प में भी इसे काफी जान माल की हानि सहनी पड़ी थी । सन ९७ या ९८ में जब मैं यहाँ रहने नहीं आई थी , तब एक समुद्री तूफान ने भी भयंकर तबाही मचाई थी । इस वर्ष यहाँ वर्षा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये थे और जगह जगह बाढ़ आई थी । यह भी माना जा रहा है कि यह भूकम्प इसी भारी वर्षा का परिणाम है ।
जैसे ही दोपहर का झटका समाप्त हुआ मैं ने झट से अंदर आकर माँ को फोन किया और बताया कि यहाँ भूकंप आया और हम ठीक हैं । फिर बिटिया को फोन किया । २६ जनवरी २००१ के भूकम्प के बाद भी मैंने झट से माँ को फोन किया । उसके बाद ३ दिन तक फोन लाइन्स बंद रहीं । तब तो टी वी पर दिन रात इसी के बारे में समाचार दिये जाते थे । भाई आज भी कहता है कि मेरा घर फोन करना एक मास्टर स्ट्रोक था । मेरी माँ को चिन्ता की भयंकर बीमारी है । वे तो किसी भी बात पर चिन्ता कर सकती हैं फिर जब वे टी वी देखती तो ना जाने कितनी चिन्ता करतीं ।
इस बार टी वी के समाचारों पर भूकम्प का कोई जिक्र भी नहीं आया । बस कभी कभार नीचे एक

पंक्ति दी जाती थी। कारण शायद यही रहा होगा कि केवल छोटे छोटे गाँव व कस्बे ही इसकी चपेट में आए थे। या शायद इसलिए की सचिन ने कप्तानी करने से इन्कार कर दिया था सो टी वी चैनल वालों ने हमारे धरतीकम्प की चर्चा करने से इन्कार कर दिया ।
टी वी पर क्या समाचार बनेगा और क्या नहीं बनेगा यह घटना पर निर्भर नहीं करता अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि उस दिन बाँकी समाचार कितने बड़े या मसालेदार हैं । कल कुछ चैनल पर तो बेरहम माँ ने ४ दिन की बच्ची को रेलवे ट्रैक पर छोड़ा ही सबसे बड़ी खबर थी । फिर सचिन जी का समाचार । सो हमारा धरतीकम्प खबर बनने से रह गया ।
हमने सोचा कि हम ही इसे खबर बना दें ।
घुघूती बासूती

Saturday, November 03, 2007

यदि टिप्पणियाँ और पाठक चाहते हैं तो विष्ठा पर लिखिये । उसके पर्यायवाची शब्द ढूँढिये ......

यदि टिप्पणियाँ और पाठक चाहते हैं तो विष्ठा पर लिखिये । उसके पर्यायवाची शब्द ढूँढिये ......
ये क्या नारी विषय या उसकी समस्याओं पर लिख रहे हैं ?
अफलातून जी की ‘ नारी के सहभाग बिना , हर बदलाव अधूरा है ।' नामक पोस्ट पर मेरी यह टिप्पणी है, सोचा आप सबको भी पढ़ा दूँ ।

अफलातून जी ,
यदि आप चाहते हैं कि अधिक लोग आपको पढ़ें व टिप्पणी करें तो आपके विषय का चुनाव बिल्कुल गलत है । हाल में कुछ दुर्गंधयुक्त विषय धड़ाधड़ हाथों हाथ लिए जा रहे हैं व उनपर बीसियों टिप्पणियाँ भी आईं । एक आप हैं कि नारी जैसे अमहत्वपूर्ण विषय पर लिख रहें हैं । नारी के विषय में लिखना है तो या तो उसपर चुटकले सुनाइये या उसका रूप विवरण कीजिये ,वह बासी ,बेमजा विषय क्या चुन रहे हैं ?
यदि लेखक अपनी पुस्तकें बेचना चाहें तो उन्हें प्यासी डायन, खूनी पंजा, जकड़ा शिकंजा, या फिर किसी ऐसे ही मनोरंजक विषय पर लिखना होगा । क्या आप जानते नहीं पुरुषों की रूचि में स्त्री की समस्याएँ विष्ठा के बहुत बाद में आती हैं ? धीरे धीरे आँखें खुल रहीं हैं और संसार की विडंबनाएँ देखने को मिल रहीं हैं ।
वैसे एक ऐसे मन के निकट के विषय पर लिखने के लिए धन्यवाद !
यदि आप में से कोई पढ़ना चाहे तो यहाँ जाइए :
http://samatavadi.wordpress.com/2007/11/02/womanwomen-bloggerchirkin/#comment-968
घुघूती बासूती

Thursday, November 01, 2007

अहसास

एक उम्र गुजर जाती है
उम्र गुजरन॓ का अहसास होन॓ तक
सब कुछ बिखर जाता है
बिखराव का अहसास होने तक ।

जीवन हाथ से निकल जाता है
रेत सा फिसलने का अहसास होने तक
सबकुछ ही बेमानी हो जाता है
अपने बेमानी होने का अहसास होने तक ।

आँचल पूरा भीग जाता है
आँसुओं के रीतने का अहसास होने तक
अपने हाथ छुड़ा लेते हैं
अपनों के जाने का अहसास होने तक ।

हाथ खाली हो चुके होते हैं
सबकुछ खोने का अहसास होने तक
आशाएँ सारी खो जाती हैं
निराश होने का अहसास होने तक ।

मौत आ चुकी होती है
जिन्दा थे का अहसास होने तक
साँसें खत्म हो चुकी होती हैं
साँस लेते थे का अहसास होने तक ।

घुघूती बासूती