Tuesday, October 30, 2007

'हम तो फल हैं'

    क्या आप जानते हैं कि कुछ लोगों के अनुसार इस संसार की लगभग आधी आबादी फल है ? आश्चर्यचकित मत होइये । वैसे मैं हुई थी । सुनकर कुछ अजीब सा लगा । समझ नहीं आया कि ग्लानि हो, अपमानित महसूस     करूँ, गुस्सा होऊँ, उपेक्षा करूँ या हँसू । अब सोचती हूँ कि जब मुझे अपने निठल्लेपन पर गुस्सा आता था, सामने कुछ ठोस करने का कोई रास्ता न होता था तो मैं स्वयं को एक वनस्पति सा महसूस करती थी । ये व्यक्ति तो वनस्पति न कह कर उसका भी एक छोटा सा भाग कह रहे थे ।
    उनके हिसाब से स्त्री एक फल है जिसे कोई भी गपाक से खा सकता है । बस हमारी इतनी ही औकात थी उनकी नजरों में !
    हुआ यूँ कि मैं अचानक टी वी वाले कमरे में आई और ये महाशय दंगों के विषय में बोल रहे थे । मारकाट तो खैर हुई ही, उनसे पूछा गया कि क्या बलात्कार आदि भी हुए थे ? वे बोले अब यदि सामने फल पड़ा हो तो आदमी खा ही लेगा ! पूछा गया कि क्या तुमने भी खाया ? बोले हाँ, हमने भी एक खाया ।
    अब कहने को क्या बचता है सिवाय इसके ...
    जहाँ नारी को पूजा जाता है वहाँ भगवान बसते हैं । जहाँ इन भगवानों को खाने को नारी रूपी फल चढ़ाये जाते हों वहाँ कौन बसता है ?

घुघूती बासूती

 

 


पुनश्च
    ये प्रश्न केवल गुजरात के संदर्भ में नहीं पूछ रही, हर दंगाई चाहे वह दंगे धर्म, आस्था, राजनीतिक कारणों, समाज में परिवर्तन लाने, अलग राज्य या देश या स्वतंत्रता पाने के लिए हों, के संदर्भ में पूछ रही हूँ । मेरा सभी पाठकों से निवेदन है कि यदि इस नजरिये पर सार्थक चर्चा कर सकते हैं तो कृपया अवश्य कीजिये । यदि यह एक राज्य को गाली देने का मंच बनाना चाहते हैं तो ऐसा न कीजिये । सजा दोषियों को देनी चाहिये, भर्त्सना दोषियों की होनी चाहिये और न्याय की माँग होनी चाहिये चाहे अन्याय कहीं भी हुआ हो, किसी ने भी किया हो ।

घुघूती बासूती

यदि साड़ी, दुपट्टा, आँचल ना होता,

यदि साड़ी, दुपट्टा, आँचल ना होता,
यदि, चूड़ी, सिन्दूर, मंगलसूत्र ना होता,
यदि करवाचौथ, छलनी, चाँद न होता,
तो हिन्दी फिल्मों का क्या होता ? एक लेख, एक चिन्ता ।

‘मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में’ । क्या सुन्दर गीत था और क्या गजब आवाज ! अभी भी मुझे टेबल टैनिस के खिलाड़ी नील की आवाज याद आती है और याद आता है हम जैसे नौसिखिया किशोर खिलाड़ियों का उन्हें मंत्रमुग्ध हो सुनना । बचपन में तीन या चार वर्ष की उम्र में एक फिल्म देखी थी, नाम तो याद नहीं, परन्तु उसका लगभग अन्तिम दृष्य अभी भी आँखों के सामने आ जाता है, नायिका समुद्र की ओर शायद आत्महत्या करने के विचार से जा रही है, साड़ी का लम्बा आँचल तेज हवा में उड़ रहा है । दृष्य बेहद उद्वेलित करने वाला था । अब सोचती हूँ कि यदि वही नायिका जीन्स/ट्राउजर्स, टीशर्ट में होती तो क्या उतनी ही सहानुभूति पाती ? यदि पाती भी तो क्या अभी भी मेरे स्मृतिपटल पर यूँ अंकित होती ?
‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का’ को कौन भूल सकता है ?

हमारे जमाने की फिल्मों में जैसे ही किसी के पति की मृत्यु होती थी, स्त्री के आँसू बाद में पोछे जाते थे, चूड़ियाँ बड़ी फुर्ती से पहले तोड़ दी जाती थीं । कभी समझ नहीं आया कि आराम से उन्हें उतार क्यों नहीं दिया जाता था । उसकी बिन्दी पोछ दी जाती थी (तब स्टिकर बिन्दियाँ शायद नहीं चली थीं) ।
सिन्दूर व मंगलसूत्र जहाँ स्त्री की परम उपलब्धि माना जाता था, वहीं यही सभी नाजायज विवाहों की जड़ भी होता था । किसी मन्दिर में जाकर मंगलसूत्र पहना दिया और चुटकी भर सिन्दूर डाल दिया और हो गया एक समाज व कानून की दृष्टि में अमान्य विवाह ! मंगलसूत्र का एक और भी जबर्दस्त उपयोग होता था । आँखों में आँसू लिए काँपती आवाज से जब स्त्री अपना मंगलसूत्र बेचने जाती थी तो यह बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती थी कि उसका पति बीमार है और घर में एक पैसा नहीं है। बदमाश, लफंगा, शराबी, जुआरी पति एक झटके में अपनी असहाय, पतिव्रता पत्नी के गले से मंगलसूत्र निकालकर बेचने को ले जाता था और पत्नी अपने सूने गले को पकड़े बिसूरती रह जाती थी ।

कभी किसी दुखी नवविवाहिता को दिखाना हो तो वह सजधजकर करवाचौथ का व्रत रखे पति की प्रतीक्षा कर रही होती है और पति कहीं और रंगरेलियाँ मना रहा होता है । (मुझे लगता है ‘साहिब बीबी और गुलाम’ एक बहुत ही क्रान्तिकारी सी फिल्म रही होगी, जहाँ नायिका बहुत ही जल्द सजने सजाने का कार्यक्रम बन्द कर अपना दुख कम करने के लिए एक नया रास्ता अपनाती है ।)

कहने का तात्पर्य यह है कि इन चिन्हों के बाद कहानी में क्या हुआ/क्या हो रहा है, एकदम साफ हो जाता था । जैसे कि केमिस्ट्री में हर ऍलीमेन्ट का एक सिम्बल/ चिन्ह होता है वैसे ही ये चिन्ह भी होते थे ।
मुझे आज के फिल्म निर्माताओं पर बहुत दया आती है, वे ये सब चिन्ह इतनी सरलता से उपयोग नहीं कर पाते । उन बेचारों को गाकर, नाचकर, आइटमगर्ल लाकर यही बातें बतानी पड़ती हैं । कभी कभी तो यह सब करने के बाद भी देखने वाला सोचता रह जाता है कि वह क्या देखकर आया है ।

घुघूती बासूती

Monday, October 29, 2007

मुझे स्त्रियों की कहे जाने वाली पत्रिकाएँ पसन्द नहीं

कई कारण हैं कि मुझे स्त्रियों की कहे जाने वाली पत्रिकाएँ पसन्द नहीं हैं ।

१ एक तो यह है कि हिन्दी में वे पत्रिकाएँ तीन या साढ़े तीन प्रान्तों को छोड़ सब जगह मिल जाती हैं । सो हमारा ये रोना रोते ही कि हिन्दी का कुछ नहीं मिलता यहाँ, वे हमारे सामने कर दी जाती हैं ।

२ उन्हें पढ़कर हमें अच्छी गृहणी बनने का रोग जकड़ना शुरू कर देता है ।

३ इतनी सारी खाने की चीजें व उनकी विधियाँ दिखाकर हमारा वजन बढ़ाया जाता है । पति के मुँह में भी पानी आ जाता है और कई बार इसी से मधुमेह की शिकायत बढ़ जाती है ।

४ तरह तरह के वस्त्र दिखाकर और आमतौर पर भयंकर से रूप में दिखाकर हमें कपड़ों की खरीददारी से ही डरा देती हैं । उन्हें देख लगता है जो हैं वे ही बेहतर हैं ।

५ आमतौर पर बताया जाता है कि कैसे सास ससुर, जो अब नहीं हैं, से अच्छे सम्बन्ध बनाए जा सकते हैं । कई बार तो हमें अच्छे सम्बन्धों का इतना लोभ हो जाता है कि बस जल्द से जल्द ऊपर जाकर सम्बन्ध सुधारने का जबर्दस्त मन होता है । यहाँ ध्यान दिया जाए कि हमारा घर इकमंजिला है ।

६ उनमें अपने को सुन्दर बनाने के इतने फॉर्मूले होते हैं जितने शायद ओर्गेनिक केमिस्ट्री, इनॉर्गेनिक केमिस्ट्री,व बॉइकेमिस्ट्री में भी कुल मिलाकर ना हों । किसे अपनाएँ व किसे छोड़ दें हमारे जैसे समतावादी के लिए निर्णय कठिन हो जाता है ।

७ एक और समस्या भी है , यहाँ सब्जी भाजी वैसे ही कम मिलती है और फल तो मिलते ही नहीं । अंडे भी १५ कि. मी . दूर से मंगाने पड़ते हैं । अब यदि इन सब को अपने पर कूट पीस कर चिपड़ लूँ तो खाएँगे क्या ?

८ पति पत्नी के लिए एक दूसरे को खुश रखने के १० नायाब तरीके पढ़ने से ही आमतर पर हमारे झगड़े होते हैं । गौर किया जाए कि अन्यथा नहीं होते ।

९ गर्मियाँ आते से ही दर्शनीय स्थलों , पहाड़ों, यहाँ, वहाँ सब जगह घूमने के बारे में बताया जाता है, जिससे महीना भर तो हमें पहाड़ की नौराई लग जाती है । करीब दस दिन गुस्सा आता है , २० दिन उदासी में बीत जाते हैं । शेष दस महीने यह निर्णय करने में बिताते हैं कि अगली गर्मियों में कहाँ कहाँ नहीं जाएँगे ।

१० दसवाँ और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि इन पत्रिकाओं, विशेषकर सौन्दर्य सम्बन्धी, याने बिना खाए फ्रिज को कैसे खाली करें वाले पन्नों की हिन्दी कुछ यों होती है हमारा मन करता है दोनों हाथों में लाल पेन लेकर बैठ जाएँ काटपीट करने । उदाहरण देखिये ....

सबसे पहले अपने फेस को कोल्ड वॉटर से वॉश कर लें । फिर लूफा से सक्रबिंग करें । ध्यान रहे कि सक्रबिंग करते टाइम खूब रबिंग भी हो जाए। इससे फेस की परफेक्ट मसाज भी हो जाएगी और स्किन हैल्दी होकर ग्लो करेगी । अब फ्रिज में से फलां सब्जी को लेकर जेन्टली सक्वीज करो । ज्यूस में .......का पल्प डाल कर स्टर करो । इसमें कॉर्न फलार मिक्स करें । अब फेस में लगाकर हाल्फ आवर छोड़ दो । जब ड्राय हो जाए तो जेन्टली कॉल्ड वॉटर से वॉश करके टॉवेल से ड्राय कर लें । अब ......लोशन से मसाज करें ।

पहले तो यह भाषा देखकर हमारा पारा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है । फिर हम सोचते हैं कि यह सब करेंगे तो बढ़िया खाने बनाने के लिए रसोई और फ्रिज में बचेगा क्या ? यदि बच भी गया तो यह सब करने के बाद कुछ करने का समय बचेगा क्या ?

घुघूती बासूती

Wednesday, October 17, 2007

'जब थामा नहीं हाथ'

'जब थामा नहीं हाथ'
मन कितना था,जानती हो?
यदि थाम लेती हाथ तो
दिल को भी थामना होता ,
यदि थाम लेते दिल
तो हाथ कैसे थामते ?
और यदि लड़खड़ा जाती
तो कैसे दे पाते सहारा?
मैंने तो गिरकर बारबार
स्वयं उठना सीखा है ,
माथे की हर चोट को
हँसकर भूलना सीखा है ।
किसी दिन सिर पर जैसे
बन जाता है हिमालय ,
कभी अरावली बनता है
और कभी मेरे बचपन की
शिवालक की पहाड़ियाँ ,
जिन पर मैं चढ़ती थी
आज वे मेरे सिर पर
बनती बिगड़ती हैं ,
चढ़ती हैं, उतरती हैं ।
और लोग कहते हैं
जीवन में न्याय नहीं है ।
मुझे तो न्याय ही दिखता है
जितना ऊँचा चढ़ोगे उतना ही
नीचे गिरा स्वयं को पाओगे ,
जितना लम्बे होओगे उतना ही
सिर जोर से जमीन से टकराएगा ।
घुघूती बासूती

Sunday, October 14, 2007

खोया बचपन

[ उसके लिए जिसे स्थान, देश, महाद्वीप, धर्म, वर्ग का अन्तर भी मन से दूर न कर सका। कभी न देखने, न सुनने, न मिलने , न छूने के बावजूद बेटा माना है । यह उस का ही , मुझसे खोया बचपन है।]
मैंने खोया है बचपन तेरा,
मीठी बातें, नटखट हरकत, भोला चेहरा ,
झील सी आँखें, आँसू तेरे, रूप सुनहरा,
मैंने खोया है प्यारा सा बचपन तेरा ।

खेल खिलौने, आँख मिचौनी,
गिर जाना, चोट लगाना, सूरत रोनी,
देर से सोना, देर से उठना, कॉपी खोनी,
पैर पटकना, हाथ झटकना, बातें अनहोनी ।

दूध न पीना, सूप न पीना,
खूब रूठना, खूब मनाना, न खाना खाना,
छत पर चढ़ना, पेड़ पर चढ़ना, सबसे लड़ना,
खूब भगाना, खूब सताना, हाथ न आना ।
घुघूती बासूती

Friday, October 12, 2007

अहमदाबाद में चिट्ठाकार भोज !

अहमदाबाद में चिट्ठाकार भोज !
अहमदाबाद में गुजरात के न जाने कितने पकवानों से निधि जी ने हमारे चिट्ठाकार मिलन को चिट्ठाकार भोज बना दिया । ढोकले ही इतने प्रकार के थे कि हम तो चकरा गये । बहुत से
व्यंजन हमारे लिये नये थे । सो नामकरण तो हो गया अहमदाबाद में चिट्ठाकार भोज !

संजय जी ने दिशा निर्देश बहुत सही दिये थे किन्तु मुझे व मेरे ड्राइवर को बड़े शहरों में खो जाने की आदत है । सो कुछ देर से ही हम पहुँचे । संजय जी व अफलातून जी से तो दिल्ली में मिल चुकी थी , यहाँ अफलातून जी की पत्नी स्वाति जी से भी मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । पंकज बेंगाणी जी, योगेश शर्मा जी , रवि कामदार जी,अभिजीत चक्रवर्ती जी एवं अफलातून जी के मित्र सुरेश जी से मिलना हुआ ।
वातावरण कुछ ऐसा था कि लगा ही नहीं कि हममें से बहुत से पहली बार मिल रहे हैं । संजय जी व पंकज जी बहुत सहज ढंग से मेजबानी कर रहे थे। राजनीति व समाजसेवा में मेरा ज्ञान अज्ञान ही कहला सकता है । सो मैं सुनती रही और बीच बीच में अपने अज्ञान को भी दर्शाती रही । स्वाति जी, जिनका ज्ञान मुझसे बहुत अधिक है और जो इन गतिविधियों से जुड़ी हुई हैं, की चुप्पी और मेरी बीच बीच में की गईं टिप्पणियाँ मुझे बार बार याद दिला रहीं थीं कि थोथा चना बाजे घना । खैर, मैं इस कहावत को झुठलाना नहीं चाहती थी सो बजती रही । और जहाँ तक बजने का प्रश्न है हमने खाँस खाँस कर सबके कानों को क्षति पहुँचाई और इसके लिए क्षमा भी नहीं माँग पाई ।

अगली पीढ़ी के हिन्दी प्रेम को देख खुशी हुई । सबसे अच्छी बात यह है कि बहुत से लोग जो कम्प्यूटर से जुड़े हैं उन्हें हिन्दी से लगाव है । सुरेश जी व अफलातून जी दूर दराज के इलाकों के उत्थान की बातें करते रहे । मुझे एक ही प्रश्न अधिकतर परेशान करता रहा कि जिन लोगों के विचारों या भाषा से हम सहमत नहीं हैं , उन्हें दायरे से बाहर रख हम क्या सही कर रहे हैं ?
इसका उत्तर मुझे नहीं मिला । अभी भी खोज रही हूँ ।

अचानक निधि जी पकवानों की सुगन्ध के साथ प्रकट हुईं तो फिर वह सुगन्ध हमें भोजन की ओर खींच ले गई । यदि हमें पता होता इतने प्रकार का माल मिलेगा तो हम दो चार दिन उपवास करके जाते ! खैर डटकर खाया और वजन बढ़ाया ।

अब हम बैठक को समाप्त करते हुए अफलातून जी के पिताजी श्री नारायण देसाई जी के अभिनन्दन के लिए चल पड़े । उन्हें ज्ञानपीठ की ओर से गुजरात विद्यापीठ, जिसके वे कुलपति हैं, में मूर्तीदेवी पुरुस्कार दिया जाना था । दो राज्यपाल व एक भूतपूर्व राज्यपाल इस समारोह में सम्मिलित थे । उनका व्यक्तित्व व सारे परिवार की सादगी मन को छू गई । यदि कोई गाँधी जी के रास्ते पर चलकर जीवन जी रहा है तो वे नारायण देसाई जी ही हैं ।

बाहर पुस्तकों का एक स्टॉल लगा था तो हमने सोचा कि अवश्य ही वे नारायण जी की लिखी पुस्तकें होंगी । किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं था । यहीं पर प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आबिद सूरती जी से भी भेंट हुई ।
अगले दिन स्टेशन पर मैंने गुजराती का अखबार खरीदा । उसमें हम जैसे अनाड़ियों के मिलन की तो खबर थी पर गुजरात को गौरान्वित करने वाले लेखक , समाज सुधारक के विषय में मुझे कुछ नहीं मिला । मन यह सोच रहा था कि बुकर प्राइज की तो भारत में भी धूम मचती है किन्तु अपने पुरुस्कारों की चर्चा भी नहीं । इस मानसिकता को क्या कहा जाए ? प्रति दिन टाइम्स औफ इन्डिया में मुखपृष्ठ पर किसी विदेशी मॉडेल या अभिनेत्री की तसवीर तो छपती है , पर जिन पर राष्ट्र गौरव कर सके उनकी नहीं ।

कुल मिलाकर दिन बहुत अच्छा बीता । अभिजीत जी, संजय जी व पंकज जी ने बहुत सहायता की और बहुत ही अपनत्व भरे वातावरण में मैंने उनसे विदाई ली । उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद ।

हैदराबाद से घर पहुँचे अभी २४ घंटे ही हुए हैं और मैंने एक पैबंद लगा सा लेख लिख ही दिया ।
मेरी निधि जी से प्रार्थना हे कि अगली बार यदि सर्दियों में मिलें तो केवल ऊँधिया व बाजरे की रोटी खिलाएँ । और वे मिलन में उपस्थित रहें ।

धन्यवाद निधि जी, संजय जी ,पंकज जी व अभिजीत जी !

घुघूती बासूती

Monday, October 08, 2007

इन्तजार

आँखों में नींद नहीं
है किसका इन्तजार
मन में चैन नहीं
क्यों हूँ बेकरार
कोई भी तारा नहीं
क्यों है अन्धकार?
न कहीं है चन्द्र मेरा
न उसकी कहीं प्रभा
बादलों ने यूँ मानो
ढका है आकाश को
ढक दिया है जैसे
मेरे ही मन आकाश को ।
शायद चन्द्र यों छिपा
बचने को मेरे प्रश्न से
जानता है प्रति निशा
होगा उसका मुझसे
मेरी बाट तकती आँखों
व मेरे प्रश्नों से सामना ।
जानता वह नहीं यह
बंदी वह फिर भी रहेगा
चाहे कितना वह भाग ले
मेरे मन में जब बस गया
तो कैसे वह मुझसे दूर है
बंद मेरी आँखों में चन्द्र है ।
नित पूछूँगी वही प्रश्न उससे
चाहे कितना भी वह टाल दे
बादलों को मैं बोल दूँगी अब
ना उसको यों परदे में छिपा
लुका छिपी तो बहुत हो गई
अब कुछ अपना उत्तर भी बता ।
सोचती हूँ चन्द्र से क्या
कोई और भी कभी करता
इतने सारे अन्तस के प्रश्न
या मैं ही हूँ इक बांवरी
जो नित जिज्ञासा लिए
करती रहती हूँ इन्तजार ।
घुघूती बासूती

Thursday, October 04, 2007

यदि बनाया होता मुझे किसी भगवान ने

यदि बनाया होता मुझे किसी भगवान ने
मुझे किसी भगवान ने नहीं बनाया,
यदि बनाया होता तो सम्पूर्ण होती
निर्दोष होती ,उत्तम होती ।
या फिर वह भगवान ही सम्पूर्ण नहीं है,
शायद मुझ पर व तुम पर वह अभ्यास कर रहा है,
और इक दिन जब वह निर्दोष बनेगा ,
तब हमारे इस संस्करण को वह रद्द कर देगा ।
तब वह मनुष्य का एक नया संस्करण बनाएगा ।
उसने बनाया होता तो न जलती मैं उसकी ही धूप में
न ठिठुरती जाड़ों की रातों में पीड़ित हो उसके हिम से
होती न इतनी असहाय जन्म से लेकर मरने तक
एक चमक होती,
पीड़ा न होती तन में
और न होती कसक मन में,
न होते आँसू आँखों में,
वहाँ बस मरना भी कुछ ऐसा न होता
दीन- हीन- करुण ।
न शरीर ऐसा होता
जिसे शीघ्रातिशीघ्र करना पड़ता आग या भूमि के हवाले ।
वह तो शायद कुछ ऐसा होता,
जो मरने पर इक पुफ़ के साथ
बन जाता राख का इक ढेर,
या बन जाता इक ढेरी भर खाद ।
न होती इतनी अपूर्ण मैं
न होती इतनी असुरक्षित
यदि बनाया होता मुझे किसी भगवान ने ।

घुघूती बासूती