Friday, September 28, 2007

चकराये मित्रों के नाम

समीर जी, पूनम जी,संजीत जी व प्रभाकर जी,मुझे बहुत शर्मिंदगी है कि मैने अपनी 'उड़ने की चाहत' नामक कविता से आप सब को परेशान किया व चकरा दिया। पर खुशी भी है कि इस बहाने आपने यह कविता पढ़ तो ली। बात यह हुयी कि मेरे ब्लौग में यह पहली कविता थी और तब मुझे अपनी रचनाओं को लेबेल करने के बारे में पता नहीं था। कुछ मित्रों ने मेरी सब कविताएँ पढ़ी पर जिनमें लेबेल नहीं था वे नहीं पढ़ी। सो मैंने सोचा कि लेबेल कर दूँ और जब यह किया तो मेरी सबसे पहली पोस्ट यहाँ भी आ गयी। अत: आपको पुरानी टिप्पणियाँ पढ़नी पड़ी और चकरा गये।अब लगता है यह लेबेल अभियान बन्द करना पड़ेगा । घुघूती बासूती

Tuesday, September 25, 2007

कविता : उड़ने की चाहत

उड़ने की चाहत

बन घुघुती जीना चाहा,
आज बन गयी पिंजरे की चिड़िया ,
पंख फैला गगन में उड़ना चाहा,
पर पंख हिलाना भूल गयी।

चाहा था आकाश में उड़ना
पर धरा की धूल बन गयी,
सोने के पिंजरे में रह कर
चांदी के दाने आहार मान गयी।

इतने वर्ष कैद में रहकर
जब मैंने फिर उड़ना चाहा,
रत्नजड़ित पंख ये मेरे
अब तो उड़ना भूल गये।

टकटकी लगाये मेरी आँखें
हर समय तकती रहती नभ को,
शायद आए मेरा पक्षी साथी
और सिखाए फिर से उड़ना।

आखिर एक साँझ
जब सारा आकाश,
चमक रहा था
सूरज कीअंतिम किरणों से।

मैंने देखा इक पक्षी
दूर गगन में मंडराता,
मेरी ही चाहत में वह
लगता था उड़ता जाता।

उसकी आँखों का केन्द्र थी मैं
उसकी चाहत का अंत थी मैं,
सोचा अब तो वह आयेगा
उड़ना फिर से मुझे सिखायेगा।

उड़ निकलूँगी उसके साथ
फिर उड़ान के सपने होंगे,
फिर गगन चूमूँगी उसके साथ
दूर उँचाइयों में हम वह होंगे।

सोचा पंछी ही जानेगा
इक दूजे पंछी का दुख,
फिर से मेरा मन जानेगा
इक साथी संग उड़ने का सुख।

देखा वह मुझे तकता
आ रहा है मेरी ओर,
मेरे इस बन्दी हृदय में
हो रहा था धड़कनों का शोर।

सोचा फिर से मैं चहकूँगी
गाऊँगी मैं गीत हजार,
सोचा फिर से मैं महकूँगी
उड़ गगन में बारम्बार।

फिर से खाऊँगी फल काफल का
फिर से पीऊँगी जल स्रोतों का,
देवदार की ऊँची डाली
नीचे होगी हरियाली।

चुन चुन नीड़ बनाऊँगी
चीड़ के कोमल पत्तों का,
झूम झूम जाऊँगी
सुन निनाद झरनों का।

कैसी तृप्ति देगी
हिमालय की शीतल बयार,
दूर तक दृष्टि देखेगी
पहाड़ी पुष्पों की बहार।

इन सपनों में खोई थी मैं
जागी आँखों सोई थी मैं,
इतने में वह आया
जो था मेरे मन भाया।

खुला हुआ था पिंजरा मेरा
बाहर मैं निकल आई,
पंखों की बाँहें
मैंने थीं फैलाईं।

उसको देख यूँ लगा
कबसे ढूँढ रहा वह मुझको,
उसके जीवन का उद्देश्य ही
इक दिन था पा लेना मुझको।

जाने कबसे घुटी आवाज
जैसे मैंने फिर से पाई,
पाकर उसको अपने आगे
इक बार मैं चहचाई।

आँखों से मिली आँखें
मैं आगे बढ़ती आई,
मन मैं हुई गुदगुदी
चोंच चोंच से टकराई।

पर यह क्या?
पंजे उसके मुझे पकड़ रहे थे
बन्धन उसके मुझको जकड रहे थे,
उसकी खूनी आँखों में मैने देखा काल
भय से मन था मेरा बेहाल।

फिर से देखा मैने उसको
फिर जाना यह राज,
मुक्ति जाना था मैने जिसको
वह तो निकला इक शाहबाज।

हाय विधि की विडम्बना
थी कितनी क्रूर,
देखे मैने थे जो सपने
हो गये सब चूर।

आखिर ले उड़ा वह
मुझे दूर गगन मे,
सहमी हुइ थी मैं
फिर भी मुसकाई मैं मन में।

माना यह था मेरा अंत
माना यह थी मेरी अन्तिम उड़ान,
किन्तु फिर से थी मैं गगन मे
पूरा हुआ था उड़ने का अरमान।

कल थी मैं पिंजरे की बन्दी
आज ना बन्दी कहलाऊँगी,
कल थी मैं धरा की कैदी
आज गगन में मर जाऊँगी।

यह थी मेरी अन्तिम यात्रा
यह थी मेरी अन्तिम उड़ान,
उड़ने की चाहत में मैंने
दे दिया था अपना जीवनदान।

अब ना था मेरा मन घबराता
अब ना था आतुर मन बेहाल,
बंद कर ली मैंने आँखे अपनी
देख अन्तिम बार सूरज लाल।

धन्यवाद ओ मेरे भक्षक
धन्यवाद ओ शाहबाज,
मुक्ति की चिर चाहत
जो तूने पूरी कर दी आज ।

घुघूती बासूती

Thursday, September 13, 2007

ब्लॉगर्स मीट? नहीं, नहीं ! हम तो ब्लॉगर्स सब्जी/ ऊँधिया करेंगे !

ब्लॉगर्स मीट? नहीं, नहीं ! हम तो ब्लॉगर्स सब्जी/ ऊँधिया करेंगे !
हिन्दी चिट्ठाजगत इतना माँसाहारी क्यों होता जा रहा है ? जब देखो मीट ! अरे भाई, कभी तो सब्जी, दाल, कढ़ी आदि भी कर लिया करिये । नहीं तो पुलाव ठीक रहेगा । माँसाहारी अपने मीट के साथ और हम अपने मटर पनीर के साथ उसे खा लेंगे ।
हमारा गुजरात तो वैसे भी लगभग शाकाहारी है। देखना जब हम यहाँ मिलेंगे तो उसे मीट नहीं कहेंगे । उसे यहाँ का प्रसिद्ध ब्लॉगर्स ऊँधिया ही कह लेंगे पर मीट तो कतई नहीं कहेंगे । अन्डा करी तक तो हम बर्दाश्त भी कर लेते , पर मीट ! राम राम ! गाँधी की जन्म भूमि में इतनी हिंसा ! हम तो रोज यही भजन करते हैं .. “वैष्णव जन तो तैके कहिये जो पीर बकरे की जाने रे ।“
अगली बार जब कोई मीट करिये तो एक बकरे के मैमने को भी बुला लीजियेगा । उसकी मैं मैं से आपका माँसाहारी , हिंसक मन भी पसीज जायेगा ।
शीघ्र ही आपको एक चिट्ठाकार ऊँधिया का वर्णन देने का वादा रहा ।
घुघूती बासूती

Tuesday, September 11, 2007

थक गयी है सीता

 

 

थक गई हूँ
थक गई हूँ सीता बन अग्नि परीक्षा देते देते
थक गई हूँ मैं सती सावित्री बन जीते जीते ।
कितना भागी यम के पीछे
सत्यवान को छुड़ाने के लिए

कितना गिड़गिड़ाई सत्यवान
को वापिस लाने के लिए ।
थक गई हूँ कर हर पल राम का अनुसरण
कुछ पल डगर मुझे अपनी चुनने दीजिये ।
कितना तड़पी इक युग भर
शापित अहिल्या शिला बनकर

कितनी प्रतीक्षा की राम की
पत्थर बनी उसकी डगर पर ।
थक गई हूँ शापित शकुन्तला बनकर
अब कुछ पल श्राप मुझे देने दीजिये ।
थक गई हूँ मन्दिरों में मूर्ति बन

कुछ पल पूजा तुम मेरी छोड़िये
थक गई हूँ रिश्तों के बोझ ढोकर
कुछ पल बेलगाम मुझे छोड़िये ।
थक गई हूँ पूज्या बनकर जीते जीते
अब केवल व्यक्ति मुझे बनने दीजिये ।

माँ, बहन, बेटी ,पत्नी ,सखी और प्रेयसी
कितने रूप में जग में जानी गई हूँ मैं
किन्तु हर रूप में रह गई कुछ प्यास सी
पाया बहुत कुछ पर खो गई खुद ही मैं ।
थक गई हूँ हर समय जीकर

औरों के लिए
अब कुछ पल स्वयं के लिए भी जीने दीजिये ।

- घुघूती बासूती

Monday, September 10, 2007

मुझे किसी मुसलमान ने धोखा नहीं दिया

 

    ललित जी , जो सन्देह आपको हो रहे हैं, वे निराधार हैं । कायदे से मुझे अपने पहले चिट्ठे पर आपकी टिप्पणी .....का उत्तर देना चाहिये । किन्तु मेरे ७ सितम्बर के चिट्ठे पर दी गई आपकी टिप्पणी अधिक विस्फोटक व हानिकारक है । हम स्त्रियाँ तो बहुत कुछ सुनने की आदी हो गईं हैं व हमारे अहम् को चोट नहीं लगेगी , ना ही स्त्री पुरुष के बीच आपकी टिप्पणी से वैमनस्य जन्मेगा । किन्तु मेरे ७ सितम्बर के चिट्ठे पर दी गई आपकी टिप्पणी दो धर्मों के बीच दुराभाव जगाने का यह काम कर सकती है । सो मुझे बहुत ही विषम सी स्थितियों व समयाभाव में भी आपकी बात का ऊत्तर देना ही होगा । क्योंकि यह विषयुक्त टिप्पणी मेरे लेख पर आई इस लिये इसका उत्तर देना मेरा नैतिक कर्त्तव्य है ।

    देखिये , देखिये , मेरा जन्म पंजाब में जहाँ हुआ था । वहाँ एक भी मुसलमान बाँकी नहीं बचा था । कुछ  समय रहते पाकिस्तान चले गये थे व बाकी आजादी के बाद चले गए,या मारे गए । वहाँ पाकिस्तान से आए वे हिन्दु व सिख भी थे जो अपना सबकुछ व अपने प्रिय जनों को लुटाकर वहाँ आए थे। सो किसी भी एक समुदाय को दोष देने के मैं विरुद्ध हूँ । मेंने अपने बचपन में उनकी कहानियाँ भी सुनी हैं जिन्होंने लुट-पिट कर भारत     आकर मेहनत मशक्कत कर एक नया संसार बसाया था , दुबारा विवाह किया था और सालों बाद पहला पति या पत्नी ढूँढता हुआ आ गया या गई । सोच सकते हो उस स्थिति को ? व्यक्ति रोए या खुश होए ? मैंने पति से कारखाने के, उस बंद कमरे के ४० वर्ष बाद ताले को तोड़कर खुलने की बात भी सुनी है, जहाँ सन्दूकों में मुसलमान परिवारों के कपड़े थे। काले पड़े गोटे के दुपट्टे , बच्चों के छोटे छोटे कपड़े , टोपियाँ , कुर्ते पजामें ! जो सब ४० साल से अपने पहनने वालों की प्रतीक्षा कर रहे थे । वे पहनने वाले जो कभी लौट कर नहीं आएँगे । जिन्हें जाने वाले वापिस आने की आस में छोड़ गए थे ।

    हाँ , ललित जी सोचते हैं कि मुझे किसी मुसलमान ने धोखा दिया । देखिये , मेंने जीवन में पहली बार किसी मुसलमान को ८ वर्ष की आयु में देखा था । ११ वर्ष की आयु में पिताजी की वापिस बदली होने के बाद, फिर कभी न कक्षा में, न खेल में, कहीं भी जहाँ तक मुझे याद है किसी मुसलमान को अपने विवाह तक देखा । ८ से ११ वर्ष की आयु में भला कोई साथी मुझे क्या धोखा देता ?

    मेरा जीवन के पहले मुसलमान बच्चे को देखना भी एक ऐसी घटना थी जिसे याद कर मैं आज भी अपनी मूर्खता या अबोधता पर हँस पड़ती हूँ । पिताजी की बदली मध्य प्रदेश में हुई । मैं खेलने बाहर निकली तो जो पड़ोस के बच्चे मिले उनके नाम मेरे लिए विचित्र थे। एक मुझसे काफी बड़ी लड़की ने अपना नाम किश्वर बताया , उससे बड़ी दीदी ने महमूदा , मेरे से ३ वर्ष बड़े ने घर का नाम बच्चन और स्कूल का एहसान अली , बहुत बड़े भाई साहब ने गुड्डन आदि बताया । ये नाम मेरे लिए अनोखे थे । मुझे अचरज में पड़ा देख गुड्डन भाई ने बताया कि वे मुसलमान हैं । मैं आश्चर्य से उन्हें देखती रही और अभी आई कहकर घर भाग गई । काम में व्यस्त माँ को हिला हिलाकर बोला ..माँ मुसलमान तो बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं । माँ बोली तो और कैसे हो सकते हैं । हम उनके जैसे वे हमारे जैसे , जाओ खेलो , सब एक जैसे होते हैं । बाद में माँ ने अपने बचपन व बाद के जीवन में आने वाले मुसलमान पड़ोसियों व सहेलियों के बहुत से किस्से सुनाए । रोज हम बच्चे मिलकर खेलते , एक दूसरे के घर भी जाते । विवाह के बाद न जाने कितने मुसलमानों से हमारी दोस्ती हुई , कितने धर्मों के बच्चों को मैंने पढ़ाया ।

    विवाह के बाद मैं हमारी एक मुसलमान ताईजी से मिली जिन्होंने हमें बहुत स्नेह दिया , जिनके लिए हम साऊदी अरब से जमजम पानी और कफन का कपड़ा लाए , जो उनकी माँग थीं । ताऊजी ने दंगों के समय अपनी स्त्री मित्र यानि ताईजी के परिवार की रक्षा की थी । उन्हें भारत पाक सीमा तक छोड़ने गए थे । कुछ ही समय बाद ताईजी ने अपने परिवार को छोड़ भारत आ ताऊजी से विवाह की इच्छा व्यक्त की थी और ताऊजी एकबार और सीमा पर जा अपनी भावी पत्नी को ले आए थे ।

   जिससे प्रेम किया वे ही मेरे पति बने, मेरी स्वयं की पसन्द के हैं , भाई की मैं बहन हूँ , पिता को तो किसी को धोखा देना नहीं आता था । आपकी तरह मैं भी कुछ बुरे लोगों,नर व नारी दोनों के विषय में जानती हूँ । मुझे किसी पुरुष से कोई शिकायत नहीं है । केवल एक सुन्दर बराबरी के समाज की कल्पना भर करना चाहती हूँ , जहाँ स्त्रियाँ ना पूजी जाएँ ना दुत्कारी जाएँ । न हमें देवी बनना है न प्रतिमा, केवल व्यक्ति बनकर रहना है । क्या यह बहुत बड़ी माँग है ? बताइये ललित जी !

घुघूती बासूती

Friday, September 07, 2007

स्त्रियों के मुद्दे पर : कुछ उत्तर, कुछ और प्रश्न !

 

 [ ललित जी को भी उत्तर दिये जाएँगे धीरे धीरे ! बात निकली है तो दूर तलक जायेगी। 

यह मेरा काफी समय पहले लिखा लेख है । शायद काफी लोगों को स्त्री के स्त्री का शत्रु होने का रहस्य या कहें कारण , यहाँ मिल जाएँगे । ]

       हमने व हमारे समाज ने क्या गलतियाँ की हैं और क्या गलतियाँ अभी भी करे जा रहे हैं इसका कुछ कुछ परिणाम तो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है, किन्तु भविष्य इन परिणामों को बहुत विकराल रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करेगा । जब तक यह परिणाम हमारे इस मूल रूप से अन्धे समाज को भी दिखने लगेगें, तब तक बहुत नहीं तो काफी देर हो चुकी होगी । समस्याएँ बहुत हैं व अधिकतर हमारी अपनी बनाई हुई ही हैं ।

     इस  समय मैं भारतीय समाज में स्त्रियों के स्थान , भ्रान्तियों व उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों कि चर्चा कर रही हूँ । आज तक इन सबसे मुख्य व प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्रियों को हानि होती थी । अतः हमारा समाज , जो कि मुख्य रूप से पुरुषों के लिए ही बना है, जहाँ का धर्म, संस्कृति , कायदे कानून, सब कुछ पुरुषों के हितों को ही ध्यान में रखकर बनाए गए हैं , चैन की नींद सो सकता था व अपने घर का कचरा कालीन के नीचे दबा सकता था । यहाँ यह भी कह दूँ कि केवल भारत या एक धर्म या समाज ही नहीं सब धर्म, संस्कृति, कायदे कानून, पुरुष के हितों को देखकर बने हैं । किन्तु आज हानि व हमला पुरुष के हितों , सुख चैन, सुविधाओं पर है । उसका व उसके समाज का अस्तित्व ही खतरे में है । स्त्रियों का तो खतरे में है ही , किन्तु वह बहुत ही सूक्ष्म बात है, पुरुष व पुरुष के अस्तित्व के सामने । सो हो सकता है, पुरुषों के साथ साथ वे अन्धी स्त्रियाँ भी , जो स्त्री के अस्तित्व, उसके आदर व उसके जीवन के महत्व को नहीं मानती, वे भी जाग जाएँ क्योंकि आखिर उनके लाड़ले बेटों का भविष्य दाँव पर लग गया है ।

    हमारा इतिहास गवाह है कि स्त्री पर जब भी , जैसे भी हो सकता था, अत्याचार किया गया । कुछ पुरुषों ने किया, कुछ स्वयं शक्ति चखने के लिए एक स्त्री ने दूसरी पर किया । यह शक्ति परीक्षण वह पुरुष पर तो कर नहीं सकती हैं ,अतः जैसे ही परिवार में उसकी स्थिति कुछ सुदृढ़ होती थी, तो वह परिवार में नई आई सदस्याओं पर कुछ रैगिंग की तर्ज पर यह शक्ति परीक्षण करती हैं । बार बार पुरुष यह कह कर कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है , अपना पल्ला झाड़ लेता है । किन्तु जब आपके बच्चे की रैगिंग में टाँग टूट जाए या जान चली जाए, तो आप महाविद्यालय प्रशासन को यह कह कर कि विद्यार्थी ही विद्यार्थी का सबसे बड़ा शत्रु है बरी तो नहीं कर देते । तो फिर परिवार में हुए अत्याचार से स्वयं को परिवार का मुखिया होने के नाते कैसे बरी कर लेते हो ?

    स्त्री को घर से निकाला गया , जलाया गया, मारा गया, मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया । उसे वश में रखने के लिए कभी उसे कुछ लालच दिया गया तो कभी उससे कुछ सुविधाएँ छीन ली गईं । लालच के रूप में सुन्दर रंग बिरंगे वस्त्र , आभूषण , रंगीन सौभाग्य चिन्ह व सब प्रकार का भोजन ग्रहण करने का अधिकार । दंडित करने व लाइन में रखने के लिए यही सब सुवधाएँ उससे छीन ली जाती थीं । उसे बताया जाता था कि ये सब सुख उसे तभी तक प्राप्य हैं जब तक वह अपने जीवन के आधार, अपने स्वामी, अपने पति को जीवित व प्रसन्न रख पाएगी । ये सब निर्जला व्रत उपवास इसी भय की देन हैं । वह पति व अपनी सुविधाओं व बहुत बार अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए भौतिक रूप से जो बन पड़ता था करती थी । किन्तु अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पति का जीवन कैसे भी बचाना अनिवार्य था । सो भौतिक रूप से सब कुछ करने के बाद वह अन्ध श्रद्धा की शरण लेती थी ।

      विश्वास न हो ऐसी स्थिति की कल्पना करिये जहाँ आपका जीवन एक पतली डोर से लटका हुआ हो, जीवित जलाए जाने की तलवार आपके सिर पर लटक रही हो । उदाहरण के लिए यदि आपका जीवन किसी ऐसी शक्ति के हाथ में हो जो बहुत शक्तिशाली, क्रूर , अविवेकी व तर्कविहीन हो, लकीर की फकीर हो , जिस पर किसी न्याय की गुहार का कोई प्रभाव न पड़ता हो । वह शक्ति या व्यक्ति आप से कहे कि जब तक आप के सिर पर बाल हैं आप जीवित रहेंगे और जिस दिन ये बाल झड़े, आपको जीवित चिता के हवाले कर दिया जाएगा । अब आपके लिए ये बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होंगे । आप एक बार खाना भूल जाएँगे किन्तु बालों की साज संवार , सफाई, व स्वास्थ्य के विषय में कभी नहीं भूलेंगे । वे बाल आपकी जान हैं, धर्म हैं , या ये कहें कि वे ही आपका जीवन हैं । अब आप जब सब तरह से उनकी रक्षा करते नहीं थकते और फिर भी देखते हैं कि समय असमय आपके मित्रों , भाइयों, चाचा , ताऊओं के बाल झड़ ही जाते हैं और ऐसा होने पर उन्हें घसीट कर चिता पर रख दिया जाता है । उनकी चीखें आपके कानों के परदों को फाड़कर आपके अन्तर्मन तक को दहला जाती हैं । सोते जागते, खाते पीते ये चीखें आपका साथ नहीं छोड़ती । तब आप आध्यात्म, अलौकिक , दैवीय, अतिमानवीय शक्तियों का भी सहारा लेने लगते हैं । आपने देखा था कि दो मित्रो के बाल तब झड़ गए जब उन्होंने खाली पेट चाय पी थी या दो और के तब जब उन्होंने अपने बालों से तंग आकर उन्हें गाली दी थी । सो अब आप खाली पेट चाय पीना छोड़ देते हैं, बालों को कभी भूले से भी गाली नहीं देते हैं । यदि कोई सुझा दे कि गले में यह हरे मोती का धागा डाल लो तो बाल अधिक समय तक टिकते हैं, सो आप वह भी कर लेते हैं । यदि कहें कि बुधवार को दाढ़ी न बनाने से बाल सुरक्षित रहते हैं तो क्या आप केवल दाढ़ी बनाने के सुख के लिए जीते जी चिता में डाले जाने का खतरा , भय, आशंका मोल लेंगे ? सो अब आप चाहेंगे कि आशीर्वाद में भी यदि कोई आपको बालवान या बालवता कहे तो बेहतर है क्योंकि आपका चिरंजीवी होना तो उनके होने पर निर्भर है । आप प्राण जाएँ पर बाल न जाएँ में पूर्ण विश्वास करेंगे । सो इसको कहते हैं कंडिशनिंग ! अब न केवल आपके चेतन मन को बालों से मोह है अपितु आपका अवचेतन मन भी बालों के प्रति मोहित है । सो अब समाज कहता है कि बालों को इतना प्रेम करना, उनका ध्यान रखना, उन्हें जान से अधिक चाहना आपका स्वभाव है । यही आपके संस्कार हैं, यही आपका धर्म है, यही आपके देश की संस्कृति है ।      बिल्कुल सही है । जिन बालों के रहते आप पलंग पर सो सकते हैं , भांति भांति के व्यंजन खा सकते हैं, रंग बिरंगे कपड़े पहन सकते हैं , सबसे बड़ी बात कि जी सकते हैं, उन बालों पर आप क्यों न बलिहारी जाएँगे । यह तो है इस जन्म की बात !

घुघूती बासूती

चर्चा चालू है । अभी नया लिखने की स्थिति में नहीं हूँ । शीघ्र ही इस विषय पर और लिखूँगी ।

Thursday, September 06, 2007

ऐसा क्यों होता है ? समाज में स्त्रियों की स्थिति पर कुछ प्रश्न ।

ऐसा क्यों होता है कि स्त्री को जन्म से पहले ही भ्रूण की अवस्था में ही मार दिया जाता है ? ऐसा क्यों होता है कि पुत्र पुत्री से अधिक प्यारा होता है ?
ऐसा क्यों होता है कि यदि साधन सीमित हों तो वे सीमित साधन केवल पुरुष को दिए जाते हैं ?
ऐसा क्यों होता है कि त्याग की अपेक्षा केवल स्त्री से की जाती है ?
ऐसा क्यों होता है कि नालायक बेटे को भी पढ़ने के लिए कहा जाता है और लायक बेटी को घर के काम काज करने को कहा जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि अबला नारी से नौकरी करके आने के बाद घर के सारे काम करने की अपेक्षा की जाती है और सबल पुरुष से गर्मागर्म चाय के बाद आराम की ?
ऐसा क्यों होता है कि स्त्री यदि कहे कि वह कुछ निर्णय पति से पूछ कर लेगी तो सब उसकी वाह वाह करते हैं, यदि पुरुष कहे कि पत्नी से पूछ कर बताएगा तो वह कमजोर या दब्बू माना जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि यदि स्त्री कहे कि उसे घर जाना है पति आ गए होंगे तो कोई उसे उलाहना नहीं देता किन्तु यदि पुरुष यही कहे तो हास्य का पात्र बन जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि पत्नी का कहा जरा भी मानने वाला बीबी का गुलाम कहलाता है किन्तु ऐसी किसी उपाधि से स्त्रियों को सुशोभित नहीं किया जाता ?
ऐसा क्यों होता है कि जन्म स्त्री देती है, बड़ा वह करती है किन्तु बच्चा पिता का ही कहलाता है?
ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर झगड़ा पुरुष करते हैं, गाली भी वही देते हैं किन्तु गालियों में नाम स्त्रियों का आता है ?
ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर युद्ध पुरुष आरम्भ करते हैं व लड़ते भी वही हैं किन्तु युद्ध की कीमत स्त्रियों को चुकानी पड़ती है ?
ऐसा क्यों होता है कि बलात्कार पुरुष करता है और अनादर स्त्री का होता है, न कि बलात्कारी का?
ऐसा क्यों होता है कि मृत्यु स्त्री लिंग है और जन्म पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि अग्नि स्त्री लिंग है और जल पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि भूख स्त्री लिंग है और भोजन पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि घृणा स्त्री लिंग है और प्रेम, स्नेह पुल्लिंग ?
घुघूती बासूती

Monday, September 03, 2007

सन्नाटे

सन्नाटे
सन्नाटे की चीखों ने कान मेरे फाड़े हैं
कब तक करूँ बर्दाश्त कोई बता दे मुझे
क्या कोई शब्द नहीं है इस संसार में
जो गूँजे और तोड़ डाले इस सन्नाटे को ?
पशु, पक्षी, यहाँ तक कि हवा भी चुपचाप है
भंवरे भी मेरे बाग के गाना भूले लगते हैं
तड़ित से कह रही हूँ कि वह जोर से कड़के
बादलों से कर रही निवेदन वे जोर से गरजें ।
सुन रही हूँ केवल मन में उठते विचारों को
अपनी ही साँस लगती मुझे है दहाड़ शेरों की
हृदय का धड़कना है जैसे टिकटिक घड़ियों की
नब्ज सुनाई देती है ज्यों हो थाप ढोलक की ।
ऐसे ही पलों में लोग बात खुद से करते हैं
नजरों में संसार की वे लोग विक्षिप्त लगते हैं
करके कोई तो बात इनसे देखे और ये जाने
किसने बनाया विक्षिप्त किसने दिये ये वीराने ।
.................घुघूती बासूती

Saturday, September 01, 2007

मोह गणित.......क्यों तुम आते हो

क्यों तुम आते हो


क्यों तुम आते हो जाने को
क्यों तुम जाते हो आने को


नित दिन का यह जाओ कहते
इक टुकड़ा मुझसे मेरे मुझ का


संग अपने तुम ले जाते हो
जब तुम कहते हो 'तुम हो '


उस टुकड़े का इक टुकड़ा
वापिस मुझे दे जाते हो


इतने टुकड़ों में बँट गई हूँ
कितने टुकड़े पास तुम्हारे


कितने मेरे पास बचे हैं
ना लग पाता अनुमान


शायद इस गणित के लिए
नया गणित ही रचना होगा


शायद नाम मोह गणित ही
उसका मुझे रखना होगा ।


घुघूती बासूती