ये दर्द ही मेरा मित्र और मेरा साथी है,
सबने छोड़ा मझधार बस दर्द ही मेरा साथी है।
छूटे वे सब लोग जो कितने प्यारे थे,
संगी साथी,माँ,बहन और भाई जो हमारे थे
वो लोग,वो रिश्ते,वो नाते जो सब सहारे थे,
वो प्यार जिसके लिये हम सबकुछ हारे थे,
वो बचपन के खेल जो कितने न्यारे थे,
वो जवानी का खुमार जिसपर हम सबकुछ वारे थे।
गुजरे वो सब दिन जब सोने सा रंग हमारा था,
हिरणी सी थी चाल,मृगनयनी नाम हमारा था,
बादल से थे बाल,चन्द्रकिरण सा रूप हमारा था,
मुट्ठी में थी किस्मत,सारा संसार हमारा था,
नन्हें पैरों की आहट,बच्चों की किलकारी से गूँजता घर हमारा था,
पीपल के खनकते पत्तों, घण्टियों की गूँज सा हास्य हमारा था।
कितने सपने आँखों ने देखे,कितने अरमान हमारे थे,
तब भी होती थी रात पर आसमान में कितने तारे थे,
मीठे थे तब आँसू, न आज से तब वे खारे थे,
होते थे तब भी झगड़े, पर वे पल कितने प्यारे थे,
बिखरे थे तब भी सपने पर मिलकर ही वे संवारे थे,
न होती थी जीत, पर ना वह, ना हम हारे थे।
ना होता था दर्द, ना दर्द से हमारा नाता था,
खुशहाली थी सब ओर और दिल कैसे गीत गाता था,
प्रेम रस से भरा था मन, प्रेम गीत मन गुनगुनाता था,
कब होती थी रात, कब नया दिन आता था,
हर दिन, हर पल एक नयी खुशी लाता था,
यही तो था वो प्यार जो मन में कमल खिलाता था।
और आज,
ये दर्द ही मेरा मित्र और मेरा साथी है,
सबने छोड़ा मझधार, बस दर्द ही मेरा साथी है।
दर्द ही है नाव, दर्द ही हमारा माझी है,
सबने छोड़ा मझधार, ये दर्द ही साथ हमारे बाकी है।
घुघूती बासूती
Wednesday, March 28, 2007
Thursday, March 22, 2007
यादें .............एक कविता
यादें
यादें तो मन्द पवन झोंकों सी हैं
जैसे हों ठंडी मादक ये पुरवाइ
यादों को न कोई रोक सका है
ये तो हैं बैरन बिल्कुल हरजाई ।
कभी ये आती लेकर संग अपने
एक मधुर सी मुस्कान अधर पर
कभी ये ही ले आती हैं बरबस
कुछ ओस की सी बूँद पलक पर ।
तोड़ा भी है इसने मन को
कुछ भीगी सी आद्र आहों से
जोड़ा भी इसने ही टूटे मन को
कुछ मीठी भूली बिसरी बातों से ।
इनमें ही फिर बँध जाती हूँ
प्रियतम की बाँहों के घेरे में
इनमें ही तो लौट बाँध लेती हूँ
उन्हें अपने झीने से आँचल में ।
ये ही तो वे हैं जो ला डाल देती
गोद प्यारी नन्ही बिटिया को
ये ही तो लौटा लाती हैं फिर से
मेरे और उसके बीते बचपन को ।
कुछ सिमटी सी कुछ लिपटी सी
यादें ही तो विरहा के गीतों में हैं
कुछ खट्टी किन्तु कुछ मीठी सी
ये तो प्रिय की हर धड़कन में हैं ।
इनकी ही तो चौखट पर जा हम
भीने मन अपना शीश झुकाते हैं
इनके ही आँगन में जा प्रेम पुष्प
अर्पित कर स्मृति दीप जलाते हैं ।
घुघूती बासूती
यादें तो मन्द पवन झोंकों सी हैं
जैसे हों ठंडी मादक ये पुरवाइ
यादों को न कोई रोक सका है
ये तो हैं बैरन बिल्कुल हरजाई ।
कभी ये आती लेकर संग अपने
एक मधुर सी मुस्कान अधर पर
कभी ये ही ले आती हैं बरबस
कुछ ओस की सी बूँद पलक पर ।
तोड़ा भी है इसने मन को
कुछ भीगी सी आद्र आहों से
जोड़ा भी इसने ही टूटे मन को
कुछ मीठी भूली बिसरी बातों से ।
इनमें ही फिर बँध जाती हूँ
प्रियतम की बाँहों के घेरे में
इनमें ही तो लौट बाँध लेती हूँ
उन्हें अपने झीने से आँचल में ।
ये ही तो वे हैं जो ला डाल देती
गोद प्यारी नन्ही बिटिया को
ये ही तो लौटा लाती हैं फिर से
मेरे और उसके बीते बचपन को ।
कुछ सिमटी सी कुछ लिपटी सी
यादें ही तो विरहा के गीतों में हैं
कुछ खट्टी किन्तु कुछ मीठी सी
ये तो प्रिय की हर धड़कन में हैं ।
इनकी ही तो चौखट पर जा हम
भीने मन अपना शीश झुकाते हैं
इनके ही आँगन में जा प्रेम पुष्प
अर्पित कर स्मृति दीप जलाते हैं ।
घुघूती बासूती
Thursday, March 08, 2007
गुजरात मेरा भी है, मुझे भी प्रिय है !
अपने गुजराती चिट्ठाकार साथी पंकज बेंगानी की पोस्ट शांतिभाई, देखो भाई अब शांति है! पर अभी मैंने एक टिप्पणी की है, जो यहाँ पुन: प्रस्तुत है:
सात वर्ष पहले मैं गुजरात आई थी और तब से यहीं हूँ । क्षमा करना, किन्तु भारत के 16 से अधिक प्रदेश देख चुकी हूँ, 12 से अधिक में रह चुकी हूँ , सो शायद मुझे कहने का थोड़ा सा अधिकार बनता है। जब यहाँ आई थी तो समाचार पत्रों में कम अपराध की घटनाएँ होती थीं । इतना सुरक्षित मैंने स्वयं को कहीं भी नहीं पाया था । फिर आया भूचाल और मैं गुजरातियों के बड़े हृदय से बहुत प्रभावित हुई । जितनी स्वतंत्रता ,सम्मान व सुरक्षा स्त्रियों को यहाँ है, भारत में कहीं नहीं है । यहाँ के लोग बुद्धिमान, स्वाभिमानी, कर्मठ हैं । अपना भाग्य स्वयं बदलते हैं । सामन्तवादियों को हर बात का दोषी ठहराने मे समय नहीं बरबाद करते । अच्छे लोग हैं । दूसरे राज्यों से आए लोगों को परदेसी नहीं महसूस करवाते । मैं बहुत खुश थी । फिर आया वह पागलपन जिसने मुझे अपने आप, अपने धर्म व भारतीयता पर लज्जित कर दिया । माना डिब्बा जलाना गलत था । जिन्होंने जलाया था उन्हें सजा देते , मोदी जी की सरकार थी , पकड़ते उन्हें ! किन्तु नहीं, वह शेर और मैमने की कहानी दोहराई गई । किसी के किए की सजा किसी और को दी गई । मैं स्तब्ध थी । फिर वही बात, जैसा कि मैंने अपनी कविता में कहा है, 'यह मैं भी तो हो सकती थी ।' मैंने अपना धर्म सब धर्मों को पढ़कर सोच विचार करके नहीं चुना था । ठीक वेसे ही अधिकतर लोग किसी धर्म में जन्म लेते हैं, किसी देश, रंग में जन्म लेते हैं अतः उन्हें उसके लिए सजा देना गलत है । जब भी आप स्वयं को किसी अन्य के स्थान पर रख कर देखेंगे तो आप अत्याचार नहीं कर सकेगें । यदि हर महिला स्वयं को उन बेबस मुसलमान औरतों के स्थान पर रख कर देखतीं तो वे अपने पति, भाई, पिता को रोकतीं । किन्तु वे तो यह सब मूक हो देख रही थीं या फिर मुसलमानों की दुकान लूटने में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहीं थीं । जिस बात ने सबसे अधिक मुझे उद्वेलित किया वह थी आम आदमी का यह उत्तर कि जो हो रहा है ठीक हो रहा है । और भूकम्प के समय सब तरह के उत्सव स्थगित हो गए थे , पर तब वे सब चलते रहे, जैसे जो हो रहा था उससे हमारा कोई लेना देना ही नहीं था । जो जीवित जलाए जा रहे थे वे हमारे कुछ नहीं लगते थे । तो यदि उनमें से कुछ आतंक की राह पकड़े तो क्या आश्चर्य है ? और आज मैं केसे स्वयं को कहीं भी सुरक्षित समझ सकती हूँ ? मैं क्या गारंटी दे सकती हूँ कि कोई उत्तराखंडी, कोई ब्राह्मण, मेरे पति, भाभी, चाची, जवाईं आदि की जाति , धर्म या प्रदेश का व्यक्ति कोई भी आगजनी , अन्याय आदि नहीं करेगा ? और जब करेगा तो उसकी सजा उन्हें या उनसे सम्बन्ध रखने के लिए मुझे नहीं मिलेगी । सो कोई भी बंगाली, पंजाबी, बिहारी, मराठी, राजस्थानी, कन्नड़,तेलगू, मुसलमान, ईसाई, अमेरिकन, कनेडियन ,पोलिश, या रुसी कहीं कोई गड़बड़ी करे तो आप मुझे भी मार सकते हैं । फिर आप सब भी तो मेरे अपने हैं , सो यदि आप अपराध करे तो मुझे सूली पर चढ़ाया जा सकता है । फिर मैं तो माँ और अध्यापक वर्ग की प्रतिनिधी भी हूँ , अतः सबसे पहले तो सजा की अधिकारी मैं हूँ । मैंने व मुझ जैसों ने आपको बनाया है, अच्छों को भी व हत्यारों को भी । सो लज्जा से मेरा सिर झुक गया था । हमारे पास एक मुसलमान महिला रहती थीं, सदा सोचती थी उन्हें कैसा लगता होगा । उन्हें फोन करती थी व अपनी विवशता पर क्षमा याचना भी करती थी । गुजरात कई बातों में महान है व मैं उसपर गर्व करती हूँ । बस कोई इस दाग को मिटा दे । कोई यह दिलासा दे दे कि हत्यारे व रेपिस्ट अपने कारनामे दुबारा नहीं दोहराएँगे ।हाँ , यह सब सब जगह होता है पर इसका मतलब यह नहीं कि गुजरात भी इस दौड़ में भाग लेने को भाग पड़े ।
सात वर्ष पहले मैं गुजरात आई थी और तब से यहीं हूँ । क्षमा करना, किन्तु भारत के 16 से अधिक प्रदेश देख चुकी हूँ, 12 से अधिक में रह चुकी हूँ , सो शायद मुझे कहने का थोड़ा सा अधिकार बनता है। जब यहाँ आई थी तो समाचार पत्रों में कम अपराध की घटनाएँ होती थीं । इतना सुरक्षित मैंने स्वयं को कहीं भी नहीं पाया था । फिर आया भूचाल और मैं गुजरातियों के बड़े हृदय से बहुत प्रभावित हुई । जितनी स्वतंत्रता ,सम्मान व सुरक्षा स्त्रियों को यहाँ है, भारत में कहीं नहीं है । यहाँ के लोग बुद्धिमान, स्वाभिमानी, कर्मठ हैं । अपना भाग्य स्वयं बदलते हैं । सामन्तवादियों को हर बात का दोषी ठहराने मे समय नहीं बरबाद करते । अच्छे लोग हैं । दूसरे राज्यों से आए लोगों को परदेसी नहीं महसूस करवाते । मैं बहुत खुश थी । फिर आया वह पागलपन जिसने मुझे अपने आप, अपने धर्म व भारतीयता पर लज्जित कर दिया । माना डिब्बा जलाना गलत था । जिन्होंने जलाया था उन्हें सजा देते , मोदी जी की सरकार थी , पकड़ते उन्हें ! किन्तु नहीं, वह शेर और मैमने की कहानी दोहराई गई । किसी के किए की सजा किसी और को दी गई । मैं स्तब्ध थी । फिर वही बात, जैसा कि मैंने अपनी कविता में कहा है, 'यह मैं भी तो हो सकती थी ।' मैंने अपना धर्म सब धर्मों को पढ़कर सोच विचार करके नहीं चुना था । ठीक वेसे ही अधिकतर लोग किसी धर्म में जन्म लेते हैं, किसी देश, रंग में जन्म लेते हैं अतः उन्हें उसके लिए सजा देना गलत है । जब भी आप स्वयं को किसी अन्य के स्थान पर रख कर देखेंगे तो आप अत्याचार नहीं कर सकेगें । यदि हर महिला स्वयं को उन बेबस मुसलमान औरतों के स्थान पर रख कर देखतीं तो वे अपने पति, भाई, पिता को रोकतीं । किन्तु वे तो यह सब मूक हो देख रही थीं या फिर मुसलमानों की दुकान लूटने में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहीं थीं । जिस बात ने सबसे अधिक मुझे उद्वेलित किया वह थी आम आदमी का यह उत्तर कि जो हो रहा है ठीक हो रहा है । और भूकम्प के समय सब तरह के उत्सव स्थगित हो गए थे , पर तब वे सब चलते रहे, जैसे जो हो रहा था उससे हमारा कोई लेना देना ही नहीं था । जो जीवित जलाए जा रहे थे वे हमारे कुछ नहीं लगते थे । तो यदि उनमें से कुछ आतंक की राह पकड़े तो क्या आश्चर्य है ? और आज मैं केसे स्वयं को कहीं भी सुरक्षित समझ सकती हूँ ? मैं क्या गारंटी दे सकती हूँ कि कोई उत्तराखंडी, कोई ब्राह्मण, मेरे पति, भाभी, चाची, जवाईं आदि की जाति , धर्म या प्रदेश का व्यक्ति कोई भी आगजनी , अन्याय आदि नहीं करेगा ? और जब करेगा तो उसकी सजा उन्हें या उनसे सम्बन्ध रखने के लिए मुझे नहीं मिलेगी । सो कोई भी बंगाली, पंजाबी, बिहारी, मराठी, राजस्थानी, कन्नड़,तेलगू, मुसलमान, ईसाई, अमेरिकन, कनेडियन ,पोलिश, या रुसी कहीं कोई गड़बड़ी करे तो आप मुझे भी मार सकते हैं । फिर आप सब भी तो मेरे अपने हैं , सो यदि आप अपराध करे तो मुझे सूली पर चढ़ाया जा सकता है । फिर मैं तो माँ और अध्यापक वर्ग की प्रतिनिधी भी हूँ , अतः सबसे पहले तो सजा की अधिकारी मैं हूँ । मैंने व मुझ जैसों ने आपको बनाया है, अच्छों को भी व हत्यारों को भी । सो लज्जा से मेरा सिर झुक गया था । हमारे पास एक मुसलमान महिला रहती थीं, सदा सोचती थी उन्हें कैसा लगता होगा । उन्हें फोन करती थी व अपनी विवशता पर क्षमा याचना भी करती थी । गुजरात कई बातों में महान है व मैं उसपर गर्व करती हूँ । बस कोई इस दाग को मिटा दे । कोई यह दिलासा दे दे कि हत्यारे व रेपिस्ट अपने कारनामे दुबारा नहीं दोहराएँगे ।हाँ , यह सब सब जगह होता है पर इसका मतलब यह नहीं कि गुजरात भी इस दौड़ में भाग लेने को भाग पड़े ।
Sunday, March 04, 2007
तेरो कुर्तो रंगीलो ,कुर्तो वालो रंगीलो ,
वे भी क्या दिन थे, वे भी क्या होली थीं ............
एक बार फिर होली हमें हमारे अकेलेपन व बालों में बढ़ती चाँदी की याद कराने आ गई है ।
अब बहना आ ही गई हो तो पधारो , बैठो । न,न वहाँ अन्दर नहीं, यहीं आँगन में बैठो । देख नहीं रहीं कैसे रंगों से सराबोर हो, यहीँ कुर्सियाँ डली हैं, आओ बैठते हैँ । पहले रंग खेलना है, क्यों नहीँ, अवश्य खेलेंगे । यह रहा थाली में टेल्कम पावडर व हल्दी । न,न बहना ये रंग न लगाओ,ये तो औद्योकिक रंग या डाई हैं । यदि असली अबीर गुलाल लाई होतीँ तो और बात थी ।
क्या कहा, पहले तो इन से भी खेल लेती थी ? हाँ सच है, तब सबकुछ चलता था, कालिख और एल्यूमिनियम पैन्ट भी , और पानी वाले रंग भी सिर पर डालने देती थी । क्यों नहीं, बिल्कुल डालने देती थी । मन तो आज भी होता है कि सब चलता है कि धुन पर होली खेलें, पर क्या करें अब नहीं चल सकता । हाँ मैं तो वही हूँ, मन भी वही है, पर ये निगोड़े बाल देख रही हो ? ये तो वे नहीं हैं । पहले की होली में तो हम रंगते थे, मन रंगता था पर अब तो सबसे पहले ये बाल रंग जाते हैं । फिर महीनों हरे, नीले, बैंगनी व गुलाबी बालों को लिए घूमना पड़ता है । बच्चे भी कहीं पीछे से नीले बालों वाली की फब्तियाँ कसने लगेगें तो क्या अच्छा लगेगा ?
फिर पहले जहाँ पति को रंग कर हम गुनगुनाते थे..
तेरो कुर्तो रंगीलो , कुर्तो वालो रंगीलो ,
..मना,मोहिनी मदनमाला मेरो मन ले रंगीलो ।
वहीं अब महीनों तक गाना पड़ेगा .....
तेरो कुर्तो रंगीलो,कुर्तो वालो रंगीलो ,
...मना,मोहिनी मदनमाला मेरो खोर ले रंगीलो ।
अर्थात पहले उनके कुर्ते व कुर्ते पहनने वाले को रंगीला पाते थे और अपने मन को भी ।
दूसरी पंक्ति के मदनमाला शब्द के बारे में पक्का नहीं कहा जा सकता,वैसे शब्दकोष देखने से लगता है मदन शब्द ठीक बैठता है, मोहिनी सूरत वालो भी हो सकता है किन्तु अब तो कहना पड़ेगा कि मेरा खोर यानि सिर भी रंगीला है ।
खैर सिर को बचाते हुए भी क्या खाक होली खेली जाती है ? सोचती हूँ कि बाथ कैप पहन कर खेलूँ । पर वह होली ही क्या जिसमें सिर की टोपी सिर पर ही कायम रहे ?
वह भी क्या समय था जब बचपन में बच्चों की टोली सारी की सारी कॉलोनी में रंग खेलती घूमती थी ! फिर आया छात्रावास का समय जब पागलपन अपनी चरम सीमा पर था । फिर पति के साथ सुबह सुबह होली खेलना और जब तक मुँहबोली ननदें व देवर भाभी से होली खेलने आते तब तक चेहरा पहचान में न आता था तो नाराज होते कि अब क्या रंगे आपको । फिर सब स्त्रियों की टोली निकल पड़ती और हर घर में जाकर रंग खेलना । वह पानी की हौदी में लगाई गई डुबकियाँ । फिर जब बिटिया आ गईं तो हमारा खेलने न जाना और ग्यारह बजे तक होली का रंग न जमना और पड़ोस की आंटी का हमसे बिटिया छीनकर जबर्दस्ती होली खेलने भेजना ! वापिस आकर बिटिया का हमें पहचानने से इन्कार व घंटो नहाने पर हमारे पास आना ।
जब बच्चे कुछ बड़े हुए तब अलग ही रंग जमना शुरू हुआ । उनके मित्र होली से पहले दिन ही हमारे घर आ जाते थे । सारी रात उनकी मस्ती चलना । सुबह से रसोईघर में बड़े बड़े भट्टों में सारी कॉलोनी के लोगों के लिए खाना बनना , नाश्ता तो हम कई दिन से बना रहे होते थे । बगीचे में सामने के लॉन व आँगन में स्त्रियों व बच्चों की होली चलती थी व पीछे की तरफ पुरुषों की । जिसने जन्म में भी होली न खेली हो उसे भी हम होली खेला कर ही दम लेते थे । पूरे भूत बन जाने के बाद वहीं पर पहले से रखे चार छः साबुन की टिकियाओं से चेहरे व बाँहों का रंग छुटाया जाता था और तेज पानी की धार में पाइप से एक दूसरे को नहलाते थे । फिर धूप में सूखने बैठ जाते थे । तब तक गरम कॉफी आ जाती थी और हम सब मिठाई व नमकीन पर टूट पड़ते थे । गर्मागर्म पकोड़ों या मसाले वड़े और कॉफी का स्वाद जो तब गीले सिर, गीले कपड़ों में आता था वैसा फिर कभी नहीं आया । खूब मस्ती होती, गीत होते, मजाक होते और तब तक खाना लग जाता ।
कल भी सब आएँगे, पर हम अपना सिर बचाएँगे । मस्ती भी होगी खाना पीना भी । पर अब न साथ में बच्चे हैं न आज रात बच्चों के मित्र होंगे । न कल घर के हर स्नानागार में कोई न कोई बच्चा नहा रहा होगा । न वह हमारे पुराने मित्र हैं न वह जगह । जीवन में बाईस घर बदले हैं व लगभग उतनी ही जगहें, पर अब लगता है हम स्वयं ही बदल गए हैं । तभी तो गुझिया, गोजे, सिहल आदि बनाने की जगह यह लिख रहे हैं । और गहरे गाढ़े रंग बनाने की जगह हल्दी व टैल्कम पावडर से खेलने का मन बना रहे हैं !
फिर भी जानती हूँ कल सुबह होते न होते होली का पागलपन सिर पर सवार हो जाएगा ।
शायद आज रात होली दहन से ही शुरू हो जाएगा । और शुरू होगा ढोलक की थाप के साथ
होली है !
और मन गा उठेगा..
तेरो कुर्तो रंगीलो ,कुर्तो वालो रंगीलो ,
..मना,मोहिनी मदनमाला मेरो मन ले रंगीलो ।
घुघूती बासूती
एक बार फिर होली हमें हमारे अकेलेपन व बालों में बढ़ती चाँदी की याद कराने आ गई है ।
अब बहना आ ही गई हो तो पधारो , बैठो । न,न वहाँ अन्दर नहीं, यहीं आँगन में बैठो । देख नहीं रहीं कैसे रंगों से सराबोर हो, यहीँ कुर्सियाँ डली हैं, आओ बैठते हैँ । पहले रंग खेलना है, क्यों नहीँ, अवश्य खेलेंगे । यह रहा थाली में टेल्कम पावडर व हल्दी । न,न बहना ये रंग न लगाओ,ये तो औद्योकिक रंग या डाई हैं । यदि असली अबीर गुलाल लाई होतीँ तो और बात थी ।
क्या कहा, पहले तो इन से भी खेल लेती थी ? हाँ सच है, तब सबकुछ चलता था, कालिख और एल्यूमिनियम पैन्ट भी , और पानी वाले रंग भी सिर पर डालने देती थी । क्यों नहीं, बिल्कुल डालने देती थी । मन तो आज भी होता है कि सब चलता है कि धुन पर होली खेलें, पर क्या करें अब नहीं चल सकता । हाँ मैं तो वही हूँ, मन भी वही है, पर ये निगोड़े बाल देख रही हो ? ये तो वे नहीं हैं । पहले की होली में तो हम रंगते थे, मन रंगता था पर अब तो सबसे पहले ये बाल रंग जाते हैं । फिर महीनों हरे, नीले, बैंगनी व गुलाबी बालों को लिए घूमना पड़ता है । बच्चे भी कहीं पीछे से नीले बालों वाली की फब्तियाँ कसने लगेगें तो क्या अच्छा लगेगा ?
फिर पहले जहाँ पति को रंग कर हम गुनगुनाते थे..
तेरो कुर्तो रंगीलो , कुर्तो वालो रंगीलो ,
..मना,मोहिनी मदनमाला मेरो मन ले रंगीलो ।
वहीं अब महीनों तक गाना पड़ेगा .....
तेरो कुर्तो रंगीलो,कुर्तो वालो रंगीलो ,
...मना,मोहिनी मदनमाला मेरो खोर ले रंगीलो ।
अर्थात पहले उनके कुर्ते व कुर्ते पहनने वाले को रंगीला पाते थे और अपने मन को भी ।
दूसरी पंक्ति के मदनमाला शब्द के बारे में पक्का नहीं कहा जा सकता,वैसे शब्दकोष देखने से लगता है मदन शब्द ठीक बैठता है, मोहिनी सूरत वालो भी हो सकता है किन्तु अब तो कहना पड़ेगा कि मेरा खोर यानि सिर भी रंगीला है ।
खैर सिर को बचाते हुए भी क्या खाक होली खेली जाती है ? सोचती हूँ कि बाथ कैप पहन कर खेलूँ । पर वह होली ही क्या जिसमें सिर की टोपी सिर पर ही कायम रहे ?
वह भी क्या समय था जब बचपन में बच्चों की टोली सारी की सारी कॉलोनी में रंग खेलती घूमती थी ! फिर आया छात्रावास का समय जब पागलपन अपनी चरम सीमा पर था । फिर पति के साथ सुबह सुबह होली खेलना और जब तक मुँहबोली ननदें व देवर भाभी से होली खेलने आते तब तक चेहरा पहचान में न आता था तो नाराज होते कि अब क्या रंगे आपको । फिर सब स्त्रियों की टोली निकल पड़ती और हर घर में जाकर रंग खेलना । वह पानी की हौदी में लगाई गई डुबकियाँ । फिर जब बिटिया आ गईं तो हमारा खेलने न जाना और ग्यारह बजे तक होली का रंग न जमना और पड़ोस की आंटी का हमसे बिटिया छीनकर जबर्दस्ती होली खेलने भेजना ! वापिस आकर बिटिया का हमें पहचानने से इन्कार व घंटो नहाने पर हमारे पास आना ।
जब बच्चे कुछ बड़े हुए तब अलग ही रंग जमना शुरू हुआ । उनके मित्र होली से पहले दिन ही हमारे घर आ जाते थे । सारी रात उनकी मस्ती चलना । सुबह से रसोईघर में बड़े बड़े भट्टों में सारी कॉलोनी के लोगों के लिए खाना बनना , नाश्ता तो हम कई दिन से बना रहे होते थे । बगीचे में सामने के लॉन व आँगन में स्त्रियों व बच्चों की होली चलती थी व पीछे की तरफ पुरुषों की । जिसने जन्म में भी होली न खेली हो उसे भी हम होली खेला कर ही दम लेते थे । पूरे भूत बन जाने के बाद वहीं पर पहले से रखे चार छः साबुन की टिकियाओं से चेहरे व बाँहों का रंग छुटाया जाता था और तेज पानी की धार में पाइप से एक दूसरे को नहलाते थे । फिर धूप में सूखने बैठ जाते थे । तब तक गरम कॉफी आ जाती थी और हम सब मिठाई व नमकीन पर टूट पड़ते थे । गर्मागर्म पकोड़ों या मसाले वड़े और कॉफी का स्वाद जो तब गीले सिर, गीले कपड़ों में आता था वैसा फिर कभी नहीं आया । खूब मस्ती होती, गीत होते, मजाक होते और तब तक खाना लग जाता ।
कल भी सब आएँगे, पर हम अपना सिर बचाएँगे । मस्ती भी होगी खाना पीना भी । पर अब न साथ में बच्चे हैं न आज रात बच्चों के मित्र होंगे । न कल घर के हर स्नानागार में कोई न कोई बच्चा नहा रहा होगा । न वह हमारे पुराने मित्र हैं न वह जगह । जीवन में बाईस घर बदले हैं व लगभग उतनी ही जगहें, पर अब लगता है हम स्वयं ही बदल गए हैं । तभी तो गुझिया, गोजे, सिहल आदि बनाने की जगह यह लिख रहे हैं । और गहरे गाढ़े रंग बनाने की जगह हल्दी व टैल्कम पावडर से खेलने का मन बना रहे हैं !
फिर भी जानती हूँ कल सुबह होते न होते होली का पागलपन सिर पर सवार हो जाएगा ।
शायद आज रात होली दहन से ही शुरू हो जाएगा । और शुरू होगा ढोलक की थाप के साथ
होली है !
और मन गा उठेगा..
तेरो कुर्तो रंगीलो ,कुर्तो वालो रंगीलो ,
..मना,मोहिनी मदनमाला मेरो मन ले रंगीलो ।
घुघूती बासूती
Saturday, March 03, 2007
मान्या जी के प्रश्नों के उत्तर.....
मान्या जी के प्रश्नों के उत्तर.....
कल रात अच्छे बच्चे की तरह बैठ कर राजीव जी के प्रश्नों के उत्तर दिये । अपने अनूठे नेट कनेक्शन के चलते सारी रात निकल गई भेजते भेजते । इस प्रक्रिया में करीब बीस बार डिसकनेक्ट हुई और मजा यह कि जब मेरा चिट्ठा गया तो दो बार चला गया ! फिर भी यत्न किया कि एक को हटा दूँ पर कुछ तो ऊपर का माला वैसे ही खाली है, कम से कम कमप्यूटर के मामले में, ऊपर से ब्रह्म मुहूर्त में वहाँ सब काम ठप्प पड़ जाता है । सो हारकर, वैसे मैं आसानी से हार नहीं मानती , मानती होती तो कब की इस नेट के चक्कर को छोड़कर राम भजन कर रही होती । सो क्षमा करना मित्रो , वही भोजन दो अलग अलग थालियों में परोस दिया । अब इतनी जिद से किन्तु प्रेम से बनाया है तो कृपया खा भी लीजिएगा और अब आप तो समझदार हैं सो आपको क्या करना है आप जानते हैं ।
जब सारी रात प्रश्नपत्र हल करते बीती हो तो मीठी नींद तो क्या ही आती । सुबह की सुहानी वेला में मैं अपने बचपन के विद्यालय के गलियारों व कक्षा में भटक रही थी । कमी थी तो अध्यापिका ने सारी कक्षा को खड़े होने की सजा भी दे रखी थी । सो कुछ घंटे खड़े खड़े बिताए । सुबह तीन अलार्मों के, पहले अलग अलग फिर समवेत चीखने से उठी । चश्मा ढूँढा , फिर चीखते बच्चों से अलार्म बंद किए । फिर सोचने लगी कल की परीक्षा में बहुत गड़बड़ हो गई , और मुझे जीवन में दूसरी बार सजा मिली । और कितने घंटे खड़ा रखा था , मेरे तो पाँव दुख रहे थे ! सोच रही थी आज तो अध्यापिका से बात नहीं करूँगी । पिछली बार जब सजा मिली थी तब भी तो यही किया था मैंने । यह सोचती हुई जब मुँह धोने लगी तो दर्पण से झाँकते चेहरे को देख हँसी आ गई । हाहा , मैं तो बच्ची नहीं हूँ । मैं तो सजा दे सकती हूँ पा नहीं सकती । भला हो इन प्रश्नों का , मेरे तो पाँव अबतक दुख रहे हैं ! सो आज के उत्तर तो दिन में ही दे दूँगी । नहीं तो आज के सपनों में कहीं पिटाई ही न हो जाए ।
सो श्री गणेशाय् नमः ।
प्र *लेखन का आपके जीवन में क्या मह्त्त्व है?
उत्तर चोली दामन का सा साथ है । पहले केवल पत्र लिखती थी , बचपन में बड़े भाई को खासकर तब जब कुछ समझ नहीं आता था तो सहायता की गुहार लगाते हुए, छात्रालय से माँ को, फिर अपने उस मित्र को जो आज मेरे पति हैं , फिर विवाह उपरांत माँ को , जब बच्चे छात्रालय गए तो प्रतिदिन उन्हें पत्र लिखती थी । फिर मोबाइल का युग आ गया तो डायरी के सिवाय लिखना बंद सा हो गया । किन्तु इतना तो जानती हूँ कि मुझ जैसों के बल पर ही डाक विभाग चलता था, अब अवश्य घाटे का बजट होगा उसका ! कभी कभार कुछ कविता या ब्लाह ब्लाह अंग्रेजी में भी लिख लेती थी । जब जब अधिक अकेली या दुखी होती या किसी ने मन दुखाया होता तो भी डायरी का ही सहारा लेती
थी । अब यहाँ देखती हूँ लोग मुझे कितना सह पाएँगे ।
प्र *अपनी स्वरचित पसंदीदा रचना कौन सी है?
उत्तर यह उत्तर दे चुकी हूँ , है। (बहुत बहुत धन्यवाद ePandit जी ! अब कोई कोष्ठक लगाना भी बता दे ! अपनी ऊपर की मंजिल भी काम करने लगी।पहली हाइपर लिंक ठोकी है। )
प्र *अपने जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के बारे में कुछ बताइये।
उत्तर एक नहीं तीन हैं , तीनों मेरे मित्र हैं। मेरे पति, मेरी बेटियाँ । पति के बारे में ही बताती हूँ। शिव हैं वे ! भगवान का नाम लेते तो शायद ही कभी सुना है किन्तु स्वभाव में शिव व जीवन दर्शन में गीता को जीते हैं। कर्मण्येव अधिकारस्ते को तो शायद स्वयं कृष्ण ने भी इतना न जिया हो, विशेषकर मा फलेषु कदाचन वाले भाग को। परिश्रम करते ही सदा देखा है। सारा दिन काम में और रात देर से घर आना । फिर फोन तो हैं ही । एक होली के दिन को छोड़कर कभी कोई छुट्टी नहीं होती। दिवाली , रविवार हर दिन दफ्तर , कारखाने जाना होता है।
शान्त स्वभाव के हैं , जियो और जीने दो में विश्वास है। बच्चों से भी बहुत स्नेह है जबकि उनके साथ बहुत कम समय बिताया है। ऊँची आवाज जीवन में एक दो बार ही की है। बहुत अच्छे वक्ता हैं। अच्छे मेन्टर, सलाहकार हैं। घर के बारे में कुछ पता नहीं है, न ही समय है या कहें कि न ही समय देते हैं। जब भी कोई खाली क्षण मिलता है तो पढ़ते हैं। कोई बुरी बात याद नहीं रखते। किसी से नाराजगी या शत्रुता नहीं।
प्र *अपनी एक बुराई और एक अच्छाई कहिये?
उत्तर एक बुराई तो यह है कि संक्षेप में लिखना नहीं आता। पर बुराई तो बहुत हैं। भावनाओं में बहती रहती हूँ । अकेले रहने की आदत हो गई है सो बड़े परिवार में नहीं रह सकती। स्वप्न बहुत देखती हूँ। किसी से भी जल्दी मोह हो जाता है। किसी से झगड़ नहीं सकती, बचपन में भी नहीं। भयंकर भुलक्कड़ हूँ। लोगों के नाम व चेहरे याद नहीं रहते। भाषा में अशुद्धि सह नहीं सकती, किन्तु अब स्वयं करने लगी हूँ, आदि।
अच्छाई यह कि किसी को मानसिक या शारीरिक कष्ट नहीं दे सकती । विद्यार्थियों पर हाथ नहीं उठाती।
प्र *मूड खराब होने पर कौन सा गीत सुनते हैं?
उत्तर मुझे जितने रोन्दू गीत हों उतने ही पसन्द हैं । सहगल व गीता दत्त प्रिय हैं। फिर गीत तो मूड एनहान्सर का काम करते हैं , यदि दुखी हो और दुख के गीत सुनो तो दुख की पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं और बस 'जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया 'की स्थिति पर पहुँचा देते हैं, सो दुखी होने पर कभी गीत नहीं सुनती । कुछ सैर के लिए अकेले चले जाती हूँ, बगीचे में पौधों से बात कर लेती हूँ। बच्चों से फोन पर बात कर लेती हूँ या फिर कुछ नहीं ।
अब मेरा उत्तीर्ण हुए का प्रमाणपत्र शिघ्राति शीघ्र भेज दीजियेगा ।
परीक्षा क्रमांक १११
घुघूती बासूती
कक्षा लोअर के जी
विद्यालय नारद गुरूकुल
चिट्ठाजगत ।
अब मेरे प्रश्न ....
१ आपको गीत, कविता, कहानी, लेख इनमें से क्या अधिक पसन्द है ?
२ क्या आपको सपने याद रहते हैं ? कोई दिलचस्प सपना सुनाइये । यदि याद नहीं तो कैसा देखना पसन्द करेंगे ?
३ क्या कभी कोई चिट्ठा आपको ऐसा लगा कि यह तो मेरे मन के भाव कह रहा है ? कौनसा?
४ जीवन का कोई मर्म स्पर्शी पल जो भूले नहीं भूलता ?
५ आपके जीवन का दर्शन (philosophy) क्या है ?
जिनसे पूछे जा रहे हैं वे हैं......
१ महेन्द्र जी
२ लावण्या जी
३ गिरीन्द्रनाथ झा जी
४ आशीष श्रीवास्तव जी
५ क्षितिज जी से ।
धन्यवाद और जो प्रश्नों से परेशान हो गए हों वे केवल अपना एक प्रिय चिट्ठा बता सकते हैं ।
घुघूती बासूती
कल रात अच्छे बच्चे की तरह बैठ कर राजीव जी के प्रश्नों के उत्तर दिये । अपने अनूठे नेट कनेक्शन के चलते सारी रात निकल गई भेजते भेजते । इस प्रक्रिया में करीब बीस बार डिसकनेक्ट हुई और मजा यह कि जब मेरा चिट्ठा गया तो दो बार चला गया ! फिर भी यत्न किया कि एक को हटा दूँ पर कुछ तो ऊपर का माला वैसे ही खाली है, कम से कम कमप्यूटर के मामले में, ऊपर से ब्रह्म मुहूर्त में वहाँ सब काम ठप्प पड़ जाता है । सो हारकर, वैसे मैं आसानी से हार नहीं मानती , मानती होती तो कब की इस नेट के चक्कर को छोड़कर राम भजन कर रही होती । सो क्षमा करना मित्रो , वही भोजन दो अलग अलग थालियों में परोस दिया । अब इतनी जिद से किन्तु प्रेम से बनाया है तो कृपया खा भी लीजिएगा और अब आप तो समझदार हैं सो आपको क्या करना है आप जानते हैं ।
जब सारी रात प्रश्नपत्र हल करते बीती हो तो मीठी नींद तो क्या ही आती । सुबह की सुहानी वेला में मैं अपने बचपन के विद्यालय के गलियारों व कक्षा में भटक रही थी । कमी थी तो अध्यापिका ने सारी कक्षा को खड़े होने की सजा भी दे रखी थी । सो कुछ घंटे खड़े खड़े बिताए । सुबह तीन अलार्मों के, पहले अलग अलग फिर समवेत चीखने से उठी । चश्मा ढूँढा , फिर चीखते बच्चों से अलार्म बंद किए । फिर सोचने लगी कल की परीक्षा में बहुत गड़बड़ हो गई , और मुझे जीवन में दूसरी बार सजा मिली । और कितने घंटे खड़ा रखा था , मेरे तो पाँव दुख रहे थे ! सोच रही थी आज तो अध्यापिका से बात नहीं करूँगी । पिछली बार जब सजा मिली थी तब भी तो यही किया था मैंने । यह सोचती हुई जब मुँह धोने लगी तो दर्पण से झाँकते चेहरे को देख हँसी आ गई । हाहा , मैं तो बच्ची नहीं हूँ । मैं तो सजा दे सकती हूँ पा नहीं सकती । भला हो इन प्रश्नों का , मेरे तो पाँव अबतक दुख रहे हैं ! सो आज के उत्तर तो दिन में ही दे दूँगी । नहीं तो आज के सपनों में कहीं पिटाई ही न हो जाए ।
सो श्री गणेशाय् नमः ।
प्र *लेखन का आपके जीवन में क्या मह्त्त्व है?
उत्तर चोली दामन का सा साथ है । पहले केवल पत्र लिखती थी , बचपन में बड़े भाई को खासकर तब जब कुछ समझ नहीं आता था तो सहायता की गुहार लगाते हुए, छात्रालय से माँ को, फिर अपने उस मित्र को जो आज मेरे पति हैं , फिर विवाह उपरांत माँ को , जब बच्चे छात्रालय गए तो प्रतिदिन उन्हें पत्र लिखती थी । फिर मोबाइल का युग आ गया तो डायरी के सिवाय लिखना बंद सा हो गया । किन्तु इतना तो जानती हूँ कि मुझ जैसों के बल पर ही डाक विभाग चलता था, अब अवश्य घाटे का बजट होगा उसका ! कभी कभार कुछ कविता या ब्लाह ब्लाह अंग्रेजी में भी लिख लेती थी । जब जब अधिक अकेली या दुखी होती या किसी ने मन दुखाया होता तो भी डायरी का ही सहारा लेती
थी । अब यहाँ देखती हूँ लोग मुझे कितना सह पाएँगे ।
प्र *अपनी स्वरचित पसंदीदा रचना कौन सी है?
उत्तर यह उत्तर दे चुकी हूँ ,
प्र *अपने जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के बारे में कुछ बताइये।
उत्तर एक नहीं तीन हैं , तीनों मेरे मित्र हैं। मेरे पति, मेरी बेटियाँ । पति के बारे में ही बताती हूँ। शिव हैं वे ! भगवान का नाम लेते तो शायद ही कभी सुना है किन्तु स्वभाव में शिव व जीवन दर्शन में गीता को जीते हैं। कर्मण्येव अधिकारस्ते को तो शायद स्वयं कृष्ण ने भी इतना न जिया हो, विशेषकर मा फलेषु कदाचन वाले भाग को। परिश्रम करते ही सदा देखा है। सारा दिन काम में और रात देर से घर आना । फिर फोन तो हैं ही । एक होली के दिन को छोड़कर कभी कोई छुट्टी नहीं होती। दिवाली , रविवार हर दिन दफ्तर , कारखाने जाना होता है।
शान्त स्वभाव के हैं , जियो और जीने दो में विश्वास है। बच्चों से भी बहुत स्नेह है जबकि उनके साथ बहुत कम समय बिताया है। ऊँची आवाज जीवन में एक दो बार ही की है। बहुत अच्छे वक्ता हैं। अच्छे मेन्टर, सलाहकार हैं। घर के बारे में कुछ पता नहीं है, न ही समय है या कहें कि न ही समय देते हैं। जब भी कोई खाली क्षण मिलता है तो पढ़ते हैं। कोई बुरी बात याद नहीं रखते। किसी से नाराजगी या शत्रुता नहीं।
प्र *अपनी एक बुराई और एक अच्छाई कहिये?
उत्तर एक बुराई तो यह है कि संक्षेप में लिखना नहीं आता। पर बुराई तो बहुत हैं। भावनाओं में बहती रहती हूँ । अकेले रहने की आदत हो गई है सो बड़े परिवार में नहीं रह सकती। स्वप्न बहुत देखती हूँ। किसी से भी जल्दी मोह हो जाता है। किसी से झगड़ नहीं सकती, बचपन में भी नहीं। भयंकर भुलक्कड़ हूँ। लोगों के नाम व चेहरे याद नहीं रहते। भाषा में अशुद्धि सह नहीं सकती, किन्तु अब स्वयं करने लगी हूँ, आदि।
अच्छाई यह कि किसी को मानसिक या शारीरिक कष्ट नहीं दे सकती । विद्यार्थियों पर हाथ नहीं उठाती।
प्र *मूड खराब होने पर कौन सा गीत सुनते हैं?
उत्तर मुझे जितने रोन्दू गीत हों उतने ही पसन्द हैं । सहगल व गीता दत्त प्रिय हैं। फिर गीत तो मूड एनहान्सर का काम करते हैं , यदि दुखी हो और दुख के गीत सुनो तो दुख की पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं और बस 'जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया 'की स्थिति पर पहुँचा देते हैं, सो दुखी होने पर कभी गीत नहीं सुनती । कुछ सैर के लिए अकेले चले जाती हूँ, बगीचे में पौधों से बात कर लेती हूँ। बच्चों से फोन पर बात कर लेती हूँ या फिर कुछ नहीं ।
अब मेरा उत्तीर्ण हुए का प्रमाणपत्र शिघ्राति शीघ्र भेज दीजियेगा ।
परीक्षा क्रमांक १११
घुघूती बासूती
कक्षा लोअर के जी
विद्यालय नारद गुरूकुल
चिट्ठाजगत ।
अब मेरे प्रश्न ....
१ आपको गीत, कविता, कहानी, लेख इनमें से क्या अधिक पसन्द है ?
२ क्या आपको सपने याद रहते हैं ? कोई दिलचस्प सपना सुनाइये । यदि याद नहीं तो कैसा देखना पसन्द करेंगे ?
३ क्या कभी कोई चिट्ठा आपको ऐसा लगा कि यह तो मेरे मन के भाव कह रहा है ? कौनसा?
४ जीवन का कोई मर्म स्पर्शी पल जो भूले नहीं भूलता ?
५ आपके जीवन का दर्शन (philosophy) क्या है ?
जिनसे पूछे जा रहे हैं वे हैं......
१ महेन्द्र जी
२ लावण्या जी
३ गिरीन्द्रनाथ झा जी
४ आशीष श्रीवास्तव जी
५ क्षितिज जी से ।
धन्यवाद और जो प्रश्नों से परेशान हो गए हों वे केवल अपना एक प्रिय चिट्ठा बता सकते हैं ।
घुघूती बासूती
Friday, March 02, 2007
मेरे उत्तर
चेतावनी ..मुझे संक्षिप्त में लिखना नहीं आता। विद्यालय के दिनों में सारांश लिखने बैठती थी तो वह मूल रचना से लम्बा हो जाता था ।
अपनी सुविधानुसार कोई भी पाँच उत्तर चुन लें, सभी समान महत्व के हैं ।
हममम् !हम तो किनारे खड़े होकर मजा ले रहे थे । भई, जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए थे हमें चिट्ठाकारिता में । कम ही लोगों को पता था कि कोई घुघूती बासूती नामक चिड़िया चिट्ठाकारिता के आकाश में विचरण करती है । सो हम तो अपनी गुमनामी में बहुत सुरक्षित महसूस कर रहे थे । कभी सोचा भी न था कि कोई हमारा नाम भी इस प्रश्नोत्तर के खेल में सुझाएगा । खैर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? सो हम भी इस चपेट में आ गए । और मजा यह कि हमें पता भी न चला । हम तो खुशी खुशी अपने छात्रों के प्रश्नपत्र बना रहे थे, हमें क्या पता था यहाँ हमारे लिए भी प्रश्नपत्र बन रहे हैं । राजीव जी, सच सच बताना, आपकी हमारे किसी छात्र से तो कोई साँठ गाँठ तो नहीं है । किसी छात्र ने तो हमारा नाम नहीं सुझाया था ? यदि ऐसा कुछ है तो अभी भी परिक्षाएँ बाँकी है और हम उसे ....
खैर, अब जब ऊखल में सिर दिया है तो मूसल से क्या डरना ? सो हम शुरू हो जाते हैं ।
प्रश्न १ आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र (फिल्म) कौन सी है?
उत्तर ..पुस्तकें तो मेरे लिए ऐसी हैं जैसे प्यासे के लिए पानी । कुछ भी पढ़ सकती हूँ । बस शब्द हिन्दी या अंग्रेजी में होने चाहिए । हिन्दी की पुस्तकें पढ़े जमाना बीत गया है । पढ़ना चाहती हूँ पर जहाँ भी मैं रहती हूँ वहाँ मिलती नहीं । सो अंग्रेजी में मुझे एलेक्स हेली की रूट्स बहुत प्रिय है । यह अमेरिका में काले लोगों की कहानी है, कैसे उन्हें अफ्रीका से पकड़ा गया और कैसे उन्हें जहाजोँ द्वारा अमेरिका लाया गया , गुलाम बनाया गया, भागने पर सजा दी गईं आदि
आदि । यह पुस्तक किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी है । मैं इसे पढ़कर अपने आँसू काबू नहीं कर पाई । यह पुस्तक पढ़े जमाना बीत गया पर आज भी किन्टा कुन्टे(या शायद कुन्टा किन्टे), इस पुस्तक का नायक, मेरे मानस पटल पर बसा हुआ है । मेरे लिए किन्टा उतना ही जीवन्त है जैसे मैं स्वयं । इस पुस्तक ने मुझे सिखाया कि मृत्यु से भयानक हो सकता है जीवन । स्वतन्त्र मरना गुलाम जीने से बेहतर है ।
दूसरी पुस्तक ऐन रैन्ड की एटलस श्रग्ड हो सकती है । दरसल बहुत सारी हो सकती हैं । किसी एक पुस्तक को दूसरे से बेहतर कहना ठीक वैसा ही है जैसे अपने एक बच्चे को दूसरे से अधिक चाहना ! फिर भी राजीव जी ने कहा है सो करना पड़ेगा । इस पुस्तक में , जैसा कि इस लेखिका की हर पुस्तक में होता है समाजवाद की धज्जियाँ उड़ाई गईं हैं । मैं उससे शत प्रतिशत सहमत हूँ । यहाँ मैं यह बता दूँ कि मैंने समाज के दोनों पहलू देखें हैं । जन्म लिया कामगार वर्ग में और आज मेनेजमेन्ट वर्ग में पत्नी के रूप में हूँ । सो दोनों वर्गों का दर्द समझ सकती हूँ । जानती हूँ कि पिताजी के पास हमारे लिए व अपने लिए, अपने भगवान के लिए समय था पर मेरे पति के पास स्वयं के लिए समय नहीं है । हर समाज में लगभग १ प्रतिशत या उससे भी कम ऐसे लोग होते हैं जो समाज की गाड़ी चलाते हैं, क्यों , पता नहीं । पर वे चलाते जाते हैं ओर उन्हीं के बल पर यह समाज टिका हुआ है । अब आप चाहें तो उन्हें सूली पर लटका दें । पर यह सच है ।
चलचित्र... मैं देखती ही नहीं । देख सकती भी नहीं , क्योंकि कोई थिएटर कभी भी आसपास नहीं था । अपने कॉलेज के दिनों में जब टेबल टेनिस के लिए अपनी यूनिवर्टी के लिए मैच खेलने लखनऊ गई थी तब कुछ फिल्में देखी थीं । तब ही बैजू बाँवरा देखी थी । उसके गाने मुझे इतने पसन्द आए कि अगले ही दिन फिर से देखने पहुँच गई ।
दूसरी साहिब बीबी और गुलाम हो सकती है । बहुत सी स्त्रियाँ उस फिल्म की नायिका मीना कुमारी जितनी ही अकेली हैं । कारण कुछ भी हों , पति जो भी करे, अच्छा या बुरा, अकेलापन तो अकेलापन ही है । आप अपने पति पर गर्व कर सकती हैं किन्तु अकेलेपन का दंश इससे कम नहीं होता, सो मैं उसका दर्द समझ सकती हूँ । अन्तर इतना ही है कि आप अपने जीवन को कौन सा मोड़ देंगे । मेरा मोड़ रचनात्मक रहा । पढ़ना लिखना मेरा जीवन बन गया । मीना कुमारी उस फिल्म में यह न कर सकी ।
प्रश्नन २ इन में से आप क्या अधिक पसन्द करते हैं पहले और दूसरे नम्बर पर चुनें - चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढ़ना, या टिप्पणी करना, या टिप्पणी पढ़ना (कोई विवरण, तर्क, कारण हो तो बेहतर)उत्तर ....चिट्ठा लिखने से तो कुछ भी बेहतर है । .चिट्ठा लिखना कुछ कुछ बच्चे को जन्म देने जैसा है, सो कठिन है । पढ़ना सबसे सरल है । पर टिप्पणी करना दूसरे दर्जे की सरलता में आता है । इसमें तर्क की बात ही कहाँ से आती है ? दूसरे के बच्चे को पुचकारना अपना बच्चा पैदा करने से कभी भी सरल है ।
वैसे एक बात है , मुझे लगता है चिट्ठा लिखना , पढ़ना ,टिप्पणी करना व पढ़ना हमें एक दूसरे के विचारों से मिलवाता है। यदि आपको आपत्ति न हो तो कहूँगी कि ..
It's a kind of meeting of minds. Minds that get free from the limitations of physical bodies, time and space and and in the cyberspace they meet, touch, influence and merge . I think , this cyber world , blogging and chatting are about the best things that happened to humankind in the last century. No other means of communication can compete with it. I am sure, the net is going to make the world a better place, because we are learning to share ideas and understand each other much better than ever before.
बस एक ही बुराई है इस सबमें कि यह सब पुस्तकें पढ़ने के समय पर डाका डालता है ।
प्रश्नन ३ आपकी अपने चिट्ठे की और अन्य चिट्ठाकार की लिखी हुई पसंदीदा पोस्ट कौन-कौन सी हैं?(पसंदीदा चिट्ठाकार और सर्वाधिक पसंदीदा पोस्ट का लेखक भिन्न हो सकते हैं)उत्तर ...यह भी कठिन है । अपनी बताना तो सरल है क्योंकि हमें तो जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए हैं । सो मेरी कविता उड़ने की चाहत मेरी सदा पसंदीदा पोस्ट रहेगी । क्योंकि मैं सच में उड़ना चाहती हूँ । मैं अपने सपनों में भी उड़ती हूँ । दुर्भाग्य से उस ही पोस्ट को सबसे कम लोगों ने पढ़ा । पर वह ही मेरी कहानी कहती है ।
मेरे खयाल से बचपन से ये उड़ने के स्वप्न देखना शायद हर प्रकार की स्वतंत्रता के प्रति मेरा दृढ़ विश्वास ,आस्था व लगन दर्शाता है । मुझे किसी भी प्रकार के बंधन सह्य नहीं हैं । न मैं किसी प्रकार की पराधीनता को स्वीकार कर सकती हूँ न किसी पर यह थोप सकती हूँ । यह स्वतंत्रता से प्रेम इस सीमा तक है कि मैं कभी एन सी सी आदि को भी न सह सकी। मैं किसी के कहने पर क्यों बाँया पैर उठाऊँ मुझे कभी समझ नहीं आया । बात हास्यास्पद तो है किन्तु सच है।
अन्य चिट्ठाकार में सृजन शिल्पी की सुभाष चन्द्र बोस पर लिखी पोस्ट है । वैसे उनकी गाँधी जी पर लिखी पोस्ट भी पसन्द है, जिससे मैं कतई भी सहमत नहीं हूँ ।
मुझे सुनील दीपक के कैमरे से कैद कुछ चित्र बहुत पसन्द हैं । उनकी समलेंगिकों पर लिखी रचना भी अच्छी लगी ।
प्रश्न4. आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
मैं भावना प्रधान व्यक्ति हूँ । सो भावनाओं से ओत प्रोत चिट्ठे पसन्द हैं । पर जानती हूँ जीवन भावनाओं से परे भी कुछ है । सो सब तरह के चिट्ठे पढ़ती हूँ । हास्य भी अच्छा लगता है । मुझे नई पीढ़ी के लोगों का लिखा पढ़ना पसन्द है क्योंकि मुझे लगता है कि वे ही संसार को बेहतर बनाएँगे और उनके चिट्ठों से उनकी नब्ज पहचानी जा सकती है । प्रसन्नता की बात यह है कि वे अच्छा लिखते हैं , अच्छा सोचते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वे हिन्दी में लिख रहें हैं सो मेरा यह संशय कि हिन्दी लुप्त हो जाएगी दूर हो गया है ।
प्रश्न ५ चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नति हुई है(जो किसी व्यवसाय अथवा सेवा में नहीं हैं वे अन्य प्रश्न चुनें)
नहीं भाई, कुछ बदलाव नहीं हुआ है सिवाय इसके कि लगता है कि कोई हमारी भी सुन रहा है । और यह भी पता चल गया कि हम ही एक भावुक अजूबे नहीं हैं बहुत से और भी इस रोग से ग्रस्त हैं । अभी तो यहाँ नई हूँ पर लगता है यह मुझे शायद एक बेहतर अध्यापिका भी बना दे ।
6. आपके मनपसन्द चिट्ठाकार कौन है और क्यों?
यह तो पिटवाने वाली बात है । कैसे कहें कौन पसन्द है ? बाँकी लोग हमारा चिट्ठा पढ़ना बंद न कर देंगे ? सो भाई लोगों हमें माफ करना, इसका उत्तर नहीं दे सकते । सो अब क्या कहें ? किसी बच्चे का नाम ले सकते हैं पर वह हमें शायद माफ न करे । कुछ नवयुवक हैं जो हमारे भविष्य हैं । उन्हें मेरा सादर प्रणाम !
7. अपने जीवन की सबसे धमाकेदार, सनसनीखेज, रोमांचकारी घटना बतायें(इसके उत्तर में विवाह की घटना का उल्लेख मान्य नहीँ है ;) )
भई ऐसा धमाका हुआ था कि आज तक नहीं भूले हैं । न कभी भूल पाएँ । आशा है बच्चे इसे नहीं पढ़ रहे । यह घटना एक पल ,एक दिन या एक सप्ताह की भी नहीं है । कुछ इतना खिंच गई कि लगभग बीस दिन चली ।
चलो छोड़ते हैं इसे और अगले प्रश्न को हल करते हैं । वैसे ही बहुत लम्बा खिंच गया है
8. आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? और क्यों?उत्तर बहुत से लोगों से मिलना चाहूँगी । अपने परिवार के सदस्यों के अलावा मैं आजतक किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिली जिसकी पढ़ने में रुचि हो । कारण मेरा जन्म से लेकर आजतक का जिया वनवास है । सो अपने जैसी रुचि वालों से मिलना सौभाग्य होगा । कैसा लगेगा जब पुस्तकों पर चर्चा होगी ! जब शब्दों से खेलेंगे! मुझे शब्द बहुत मोहित करते हैं । कई बार तो वे मनुष्यों से भी अधिक जीवंत लगते हैं । अच्छे अच्छे शब्द जब मुख से निकलते होंगे तो कैसा लगता होगा ! आजतक तो वे मुझे केवल पुस्तकों में से झाँकते ही मिलते हैं । जब चर्चा मुद्दों पर होगी, कुछ बहस भी हो शायद !
मैं सुनील दीपक जी से मिलना चाहूँगी क्योंकि कुछ विषयों पर उनके विचार मुझे कुछ कुछ अपने जैसे लगे । वैसे अभी कम दिन हुए हैं मुझे यहाँ आए इसलिए कोई भी धारणा बनाना गलत होगा । सृजन जी व उनकी पत्नी से मिलना चाहूँगी । वैसे हमारे विचार बहुत अलग हैं शायद ।
या शायद न मिलना चाहूँ , कहीं ऐसा न हो जीवन के बहुत से अन्य भ्रमों की भाँति पढ़ने लिखने का चाव रखने वालों के बारे में जो मेरा विचार है वह भी न टूट जाए ।
आशा है यदि प्रथम श्रेणी न भी दें तो उत्तीर्ण तो राजीव जी कर ही देंगे ।
धन्यवाद ।
मुझे नहीं लगता कि कोई भी सदस्य अब तक उत्तर देने से बचा होगा ।
खैर हम पूछ ही लेते हैं ।
मेरे प्रश्न ये है
प्रश्न१ एक अच्छी पुस्तक और एक अच्छे टी वी कार्यक्रम में से आप क्या चुनेंगे ?
प्रश्न२ यदि एक सप्ताह तक आपको कमप्यूटर से दूर रहना पड़े तो आपको कैसा लगेगा ?
प्रश्न३ यदि आपकी सलाह से भगवान काम करने लगे तो आप उसे पहली सलाह क्या और क्यों देंगे ?
प्रश्न४ यदि आपको किसी पत्रिका का सम्पादक बना दिया जाए तो आप किन चिट्ठाकारों की रचनाएँ अपनी पत्रिका में छापेगें ?
प्रश्न५ यदि आपको जीवन का कोई एक दिन फिर से जीने को मिले तो वह कौन सा होगा और क्यों ?
मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं ...
अचानक गणित याद आया, मेरा प्रिय विषय और मैं क्या मूर्खता करने जा रही थी ? यदि हर व्यक्ति ५ लोगों से प्रश्न पूछेगा और यह क्रम चलता रहेगा तो यदि १ व्यक्ति से आरम्भ करें तो ५वें राउन्ड तक ७८१ लोग उत्तर दे चुके होंगे । तो अब मेरी पकड़ में कौन आएगा ?
फिर भी यत्न तो करा ही जा सकता है। मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं .
१ अभय तिवारी जी
२ अतुल शर्मा जी
३ देवेश वशिष्ठ जी
४ पूनम जी
५ रजनी भार्गव जी
देर से उत्तर देने के लिए क्षमा चाहती हूँ । जब आपको पता चलेगा कि मेरा आधे से भी अधिक समय नेट कनेक्ट करने में जाता है और मेरे नेट की गति कभी ४.५ के बी पी एस तो कभी १४ होती है तो आप मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे ।
और अपने नेट से संघर्ष करते अभी अभी मान्या जी के उत्तरों पर पहुँची तो पाया उन्होंने भी प्रश्न किये हैं । सो रात के ढाई बज रहे हैं , अब अपनी यह उत्तर पुस्तिका जमा कराती हूँ, मान्या जी के उत्तर अगले अंक में ।वैसे अब सुबह के ४ बजने वाले हैं और मेरा नेट से युद्ध जारी है । पर आज भेज कर ही रहूँगी ।
घुघूती बासूती
अपनी सुविधानुसार कोई भी पाँच उत्तर चुन लें, सभी समान महत्व के हैं ।
हममम् !हम तो किनारे खड़े होकर मजा ले रहे थे । भई, जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए थे हमें चिट्ठाकारिता में । कम ही लोगों को पता था कि कोई घुघूती बासूती नामक चिड़िया चिट्ठाकारिता के आकाश में विचरण करती है । सो हम तो अपनी गुमनामी में बहुत सुरक्षित महसूस कर रहे थे । कभी सोचा भी न था कि कोई हमारा नाम भी इस प्रश्नोत्तर के खेल में सुझाएगा । खैर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? सो हम भी इस चपेट में आ गए । और मजा यह कि हमें पता भी न चला । हम तो खुशी खुशी अपने छात्रों के प्रश्नपत्र बना रहे थे, हमें क्या पता था यहाँ हमारे लिए भी प्रश्नपत्र बन रहे हैं । राजीव जी, सच सच बताना, आपकी हमारे किसी छात्र से तो कोई साँठ गाँठ तो नहीं है । किसी छात्र ने तो हमारा नाम नहीं सुझाया था ? यदि ऐसा कुछ है तो अभी भी परिक्षाएँ बाँकी है और हम उसे ....
खैर, अब जब ऊखल में सिर दिया है तो मूसल से क्या डरना ? सो हम शुरू हो जाते हैं ।
प्रश्न १ आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र (फिल्म) कौन सी है?
उत्तर ..पुस्तकें तो मेरे लिए ऐसी हैं जैसे प्यासे के लिए पानी । कुछ भी पढ़ सकती हूँ । बस शब्द हिन्दी या अंग्रेजी में होने चाहिए । हिन्दी की पुस्तकें पढ़े जमाना बीत गया है । पढ़ना चाहती हूँ पर जहाँ भी मैं रहती हूँ वहाँ मिलती नहीं । सो अंग्रेजी में मुझे एलेक्स हेली की रूट्स बहुत प्रिय है । यह अमेरिका में काले लोगों की कहानी है, कैसे उन्हें अफ्रीका से पकड़ा गया और कैसे उन्हें जहाजोँ द्वारा अमेरिका लाया गया , गुलाम बनाया गया, भागने पर सजा दी गईं आदि
आदि । यह पुस्तक किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी है । मैं इसे पढ़कर अपने आँसू काबू नहीं कर पाई । यह पुस्तक पढ़े जमाना बीत गया पर आज भी किन्टा कुन्टे(या शायद कुन्टा किन्टे), इस पुस्तक का नायक, मेरे मानस पटल पर बसा हुआ है । मेरे लिए किन्टा उतना ही जीवन्त है जैसे मैं स्वयं । इस पुस्तक ने मुझे सिखाया कि मृत्यु से भयानक हो सकता है जीवन । स्वतन्त्र मरना गुलाम जीने से बेहतर है ।
दूसरी पुस्तक ऐन रैन्ड की एटलस श्रग्ड हो सकती है । दरसल बहुत सारी हो सकती हैं । किसी एक पुस्तक को दूसरे से बेहतर कहना ठीक वैसा ही है जैसे अपने एक बच्चे को दूसरे से अधिक चाहना ! फिर भी राजीव जी ने कहा है सो करना पड़ेगा । इस पुस्तक में , जैसा कि इस लेखिका की हर पुस्तक में होता है समाजवाद की धज्जियाँ उड़ाई गईं हैं । मैं उससे शत प्रतिशत सहमत हूँ । यहाँ मैं यह बता दूँ कि मैंने समाज के दोनों पहलू देखें हैं । जन्म लिया कामगार वर्ग में और आज मेनेजमेन्ट वर्ग में पत्नी के रूप में हूँ । सो दोनों वर्गों का दर्द समझ सकती हूँ । जानती हूँ कि पिताजी के पास हमारे लिए व अपने लिए, अपने भगवान के लिए समय था पर मेरे पति के पास स्वयं के लिए समय नहीं है । हर समाज में लगभग १ प्रतिशत या उससे भी कम ऐसे लोग होते हैं जो समाज की गाड़ी चलाते हैं, क्यों , पता नहीं । पर वे चलाते जाते हैं ओर उन्हीं के बल पर यह समाज टिका हुआ है । अब आप चाहें तो उन्हें सूली पर लटका दें । पर यह सच है ।
चलचित्र... मैं देखती ही नहीं । देख सकती भी नहीं , क्योंकि कोई थिएटर कभी भी आसपास नहीं था । अपने कॉलेज के दिनों में जब टेबल टेनिस के लिए अपनी यूनिवर्टी के लिए मैच खेलने लखनऊ गई थी तब कुछ फिल्में देखी थीं । तब ही बैजू बाँवरा देखी थी । उसके गाने मुझे इतने पसन्द आए कि अगले ही दिन फिर से देखने पहुँच गई ।
दूसरी साहिब बीबी और गुलाम हो सकती है । बहुत सी स्त्रियाँ उस फिल्म की नायिका मीना कुमारी जितनी ही अकेली हैं । कारण कुछ भी हों , पति जो भी करे, अच्छा या बुरा, अकेलापन तो अकेलापन ही है । आप अपने पति पर गर्व कर सकती हैं किन्तु अकेलेपन का दंश इससे कम नहीं होता, सो मैं उसका दर्द समझ सकती हूँ । अन्तर इतना ही है कि आप अपने जीवन को कौन सा मोड़ देंगे । मेरा मोड़ रचनात्मक रहा । पढ़ना लिखना मेरा जीवन बन गया । मीना कुमारी उस फिल्म में यह न कर सकी ।
प्रश्नन २ इन में से आप क्या अधिक पसन्द करते हैं पहले और दूसरे नम्बर पर चुनें - चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढ़ना, या टिप्पणी करना, या टिप्पणी पढ़ना (कोई विवरण, तर्क, कारण हो तो बेहतर)उत्तर ....चिट्ठा लिखने से तो कुछ भी बेहतर है । .चिट्ठा लिखना कुछ कुछ बच्चे को जन्म देने जैसा है, सो कठिन है । पढ़ना सबसे सरल है । पर टिप्पणी करना दूसरे दर्जे की सरलता में आता है । इसमें तर्क की बात ही कहाँ से आती है ? दूसरे के बच्चे को पुचकारना अपना बच्चा पैदा करने से कभी भी सरल है ।
वैसे एक बात है , मुझे लगता है चिट्ठा लिखना , पढ़ना ,टिप्पणी करना व पढ़ना हमें एक दूसरे के विचारों से मिलवाता है। यदि आपको आपत्ति न हो तो कहूँगी कि ..
It's a kind of meeting of minds. Minds that get free from the limitations of physical bodies, time and space and and in the cyberspace they meet, touch, influence and merge . I think , this cyber world , blogging and chatting are about the best things that happened to humankind in the last century. No other means of communication can compete with it. I am sure, the net is going to make the world a better place, because we are learning to share ideas and understand each other much better than ever before.
बस एक ही बुराई है इस सबमें कि यह सब पुस्तकें पढ़ने के समय पर डाका डालता है ।
प्रश्नन ३ आपकी अपने चिट्ठे की और अन्य चिट्ठाकार की लिखी हुई पसंदीदा पोस्ट कौन-कौन सी हैं?(पसंदीदा चिट्ठाकार और सर्वाधिक पसंदीदा पोस्ट का लेखक भिन्न हो सकते हैं)उत्तर ...यह भी कठिन है । अपनी बताना तो सरल है क्योंकि हमें तो जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए हैं । सो मेरी कविता उड़ने की चाहत मेरी सदा पसंदीदा पोस्ट रहेगी । क्योंकि मैं सच में उड़ना चाहती हूँ । मैं अपने सपनों में भी उड़ती हूँ । दुर्भाग्य से उस ही पोस्ट को सबसे कम लोगों ने पढ़ा । पर वह ही मेरी कहानी कहती है ।
मेरे खयाल से बचपन से ये उड़ने के स्वप्न देखना शायद हर प्रकार की स्वतंत्रता के प्रति मेरा दृढ़ विश्वास ,आस्था व लगन दर्शाता है । मुझे किसी भी प्रकार के बंधन सह्य नहीं हैं । न मैं किसी प्रकार की पराधीनता को स्वीकार कर सकती हूँ न किसी पर यह थोप सकती हूँ । यह स्वतंत्रता से प्रेम इस सीमा तक है कि मैं कभी एन सी सी आदि को भी न सह सकी। मैं किसी के कहने पर क्यों बाँया पैर उठाऊँ मुझे कभी समझ नहीं आया । बात हास्यास्पद तो है किन्तु सच है।
अन्य चिट्ठाकार में सृजन शिल्पी की सुभाष चन्द्र बोस पर लिखी पोस्ट है । वैसे उनकी गाँधी जी पर लिखी पोस्ट भी पसन्द है, जिससे मैं कतई भी सहमत नहीं हूँ ।
मुझे सुनील दीपक के कैमरे से कैद कुछ चित्र बहुत पसन्द हैं । उनकी समलेंगिकों पर लिखी रचना भी अच्छी लगी ।
प्रश्न4. आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
मैं भावना प्रधान व्यक्ति हूँ । सो भावनाओं से ओत प्रोत चिट्ठे पसन्द हैं । पर जानती हूँ जीवन भावनाओं से परे भी कुछ है । सो सब तरह के चिट्ठे पढ़ती हूँ । हास्य भी अच्छा लगता है । मुझे नई पीढ़ी के लोगों का लिखा पढ़ना पसन्द है क्योंकि मुझे लगता है कि वे ही संसार को बेहतर बनाएँगे और उनके चिट्ठों से उनकी नब्ज पहचानी जा सकती है । प्रसन्नता की बात यह है कि वे अच्छा लिखते हैं , अच्छा सोचते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वे हिन्दी में लिख रहें हैं सो मेरा यह संशय कि हिन्दी लुप्त हो जाएगी दूर हो गया है ।
प्रश्न ५ चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नति हुई है(जो किसी व्यवसाय अथवा सेवा में नहीं हैं वे अन्य प्रश्न चुनें)
नहीं भाई, कुछ बदलाव नहीं हुआ है सिवाय इसके कि लगता है कि कोई हमारी भी सुन रहा है । और यह भी पता चल गया कि हम ही एक भावुक अजूबे नहीं हैं बहुत से और भी इस रोग से ग्रस्त हैं । अभी तो यहाँ नई हूँ पर लगता है यह मुझे शायद एक बेहतर अध्यापिका भी बना दे ।
6. आपके मनपसन्द चिट्ठाकार कौन है और क्यों?
यह तो पिटवाने वाली बात है । कैसे कहें कौन पसन्द है ? बाँकी लोग हमारा चिट्ठा पढ़ना बंद न कर देंगे ? सो भाई लोगों हमें माफ करना, इसका उत्तर नहीं दे सकते । सो अब क्या कहें ? किसी बच्चे का नाम ले सकते हैं पर वह हमें शायद माफ न करे । कुछ नवयुवक हैं जो हमारे भविष्य हैं । उन्हें मेरा सादर प्रणाम !
7. अपने जीवन की सबसे धमाकेदार, सनसनीखेज, रोमांचकारी घटना बतायें(इसके उत्तर में विवाह की घटना का उल्लेख मान्य नहीँ है ;) )
भई ऐसा धमाका हुआ था कि आज तक नहीं भूले हैं । न कभी भूल पाएँ । आशा है बच्चे इसे नहीं पढ़ रहे । यह घटना एक पल ,एक दिन या एक सप्ताह की भी नहीं है । कुछ इतना खिंच गई कि लगभग बीस दिन चली ।
चलो छोड़ते हैं इसे और अगले प्रश्न को हल करते हैं । वैसे ही बहुत लम्बा खिंच गया है
8. आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? और क्यों?उत्तर बहुत से लोगों से मिलना चाहूँगी । अपने परिवार के सदस्यों के अलावा मैं आजतक किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिली जिसकी पढ़ने में रुचि हो । कारण मेरा जन्म से लेकर आजतक का जिया वनवास है । सो अपने जैसी रुचि वालों से मिलना सौभाग्य होगा । कैसा लगेगा जब पुस्तकों पर चर्चा होगी ! जब शब्दों से खेलेंगे! मुझे शब्द बहुत मोहित करते हैं । कई बार तो वे मनुष्यों से भी अधिक जीवंत लगते हैं । अच्छे अच्छे शब्द जब मुख से निकलते होंगे तो कैसा लगता होगा ! आजतक तो वे मुझे केवल पुस्तकों में से झाँकते ही मिलते हैं । जब चर्चा मुद्दों पर होगी, कुछ बहस भी हो शायद !
मैं सुनील दीपक जी से मिलना चाहूँगी क्योंकि कुछ विषयों पर उनके विचार मुझे कुछ कुछ अपने जैसे लगे । वैसे अभी कम दिन हुए हैं मुझे यहाँ आए इसलिए कोई भी धारणा बनाना गलत होगा । सृजन जी व उनकी पत्नी से मिलना चाहूँगी । वैसे हमारे विचार बहुत अलग हैं शायद ।
या शायद न मिलना चाहूँ , कहीं ऐसा न हो जीवन के बहुत से अन्य भ्रमों की भाँति पढ़ने लिखने का चाव रखने वालों के बारे में जो मेरा विचार है वह भी न टूट जाए ।
आशा है यदि प्रथम श्रेणी न भी दें तो उत्तीर्ण तो राजीव जी कर ही देंगे ।
धन्यवाद ।
मुझे नहीं लगता कि कोई भी सदस्य अब तक उत्तर देने से बचा होगा ।
खैर हम पूछ ही लेते हैं ।
मेरे प्रश्न ये है
प्रश्न१ एक अच्छी पुस्तक और एक अच्छे टी वी कार्यक्रम में से आप क्या चुनेंगे ?
प्रश्न२ यदि एक सप्ताह तक आपको कमप्यूटर से दूर रहना पड़े तो आपको कैसा लगेगा ?
प्रश्न३ यदि आपकी सलाह से भगवान काम करने लगे तो आप उसे पहली सलाह क्या और क्यों देंगे ?
प्रश्न४ यदि आपको किसी पत्रिका का सम्पादक बना दिया जाए तो आप किन चिट्ठाकारों की रचनाएँ अपनी पत्रिका में छापेगें ?
प्रश्न५ यदि आपको जीवन का कोई एक दिन फिर से जीने को मिले तो वह कौन सा होगा और क्यों ?
मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं ...
अचानक गणित याद आया, मेरा प्रिय विषय और मैं क्या मूर्खता करने जा रही थी ? यदि हर व्यक्ति ५ लोगों से प्रश्न पूछेगा और यह क्रम चलता रहेगा तो यदि १ व्यक्ति से आरम्भ करें तो ५वें राउन्ड तक ७८१ लोग उत्तर दे चुके होंगे । तो अब मेरी पकड़ में कौन आएगा ?
फिर भी यत्न तो करा ही जा सकता है। मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं .
१ अभय तिवारी जी
२ अतुल शर्मा जी
३ देवेश वशिष्ठ जी
४ पूनम जी
५ रजनी भार्गव जी
देर से उत्तर देने के लिए क्षमा चाहती हूँ । जब आपको पता चलेगा कि मेरा आधे से भी अधिक समय नेट कनेक्ट करने में जाता है और मेरे नेट की गति कभी ४.५ के बी पी एस तो कभी १४ होती है तो आप मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे ।
और अपने नेट से संघर्ष करते अभी अभी मान्या जी के उत्तरों पर पहुँची तो पाया उन्होंने भी प्रश्न किये हैं । सो रात के ढाई बज रहे हैं , अब अपनी यह उत्तर पुस्तिका जमा कराती हूँ, मान्या जी के उत्तर अगले अंक में ।वैसे अब सुबह के ४ बजने वाले हैं और मेरा नेट से युद्ध जारी है । पर आज भेज कर ही रहूँगी ।
घुघूती बासूती
मेरे उत्तर
चेतावनी ..मुझे संक्षिप्त में लिखना नहीं आता। विद्यालय के दिनों में सारांश लिखने बैठती थी तो वह मूल रचना से लम्बा हो जाता था ।
अपनी सुविधानुसार कोई भी पाँच उत्तर चुन लें, सभी समान महत्व के हैं ।
हममम् !हम तो किनारे खड़े होकर मजा ले रहे थे । भई, जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए थे हमें चिट्ठाकारिता में । कम ही लोगों को पता था कि कोई घुघूती बासूती नामक चिड़िया चिट्ठाकारिता के आकाश में विचरण करती है । सो हम तो अपनी गुमनामी में बहुत सुरक्षित महसूस कर रहे थे । कभी सोचा भी न था कि कोई हमारा नाम भी इस प्रश्नोत्तर के खेल में सुझाएगा । खैर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? सो हम भी इस चपेट में आ गए । और मजा यह कि हमें पता भी न चला । हम तो खुशी खुशी अपने छात्रों के प्रश्नपत्र बना रहे थे, हमें क्या पता था यहाँ हमारे लिए भी प्रश्नपत्र बन रहे हैं । राजीव जी, सच सच बताना, आपकी हमारे किसी छात्र से तो कोई साँठ गाँठ तो नहीं है । किसी छात्र ने तो हमारा नाम नहीं सुझाया था ? यदि ऐसा कुछ है तो अभी भी परिक्षाएँ बाँकी है और हम उसे ....
खैर, अब जब ऊखल में सिर दिया है तो मूसल से क्या डरना ? सो हम शुरू हो जाते हैं ।
प्रश्न १ आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र (फिल्म) कौन सी है?
उत्तर ..पुस्तकें तो मेरे लिए ऐसी हैं जैसे प्यासे के लिए पानी । कुछ भी पढ़ सकती हूँ । बस शब्द हिन्दी या अंग्रेजी में होने चाहिए । हिन्दी की पुस्तकें पढ़े जमाना बीत गया है । पढ़ना चाहती हूँ पर जहाँ भी मैं रहती हूँ वहाँ मिलती नहीं । सो अंग्रेजी में मुझे एलेक्स हेली की रूट्स बहुत प्रिय है । यह अमेरिका में काले लोगों की कहानी है, कैसे उन्हें अफ्रीका से पकड़ा गया और कैसे उन्हें जहाजोँ द्वारा अमेरिका लाया गया , गुलाम बनाया गया, भागने पर सजा दी गईं आदि
आदि । यह पुस्तक किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी है । मैं इसे पढ़कर अपने आँसू काबू नहीं कर पाई । यह पुस्तक पढ़े जमाना बीत गया पर आज भी किन्टा कुन्टे(या शायद कुन्टा किन्टे), इस पुस्तक का नायक, मेरे मानस पटल पर बसा हुआ है । मेरे लिए किन्टा उतना ही जीवन्त है जैसे मैं स्वयं । इस पुस्तक ने मुझे सिखाया कि मृत्यु से भयानक हो सकता है जीवन । स्वतन्त्र मरना गुलाम जीने से बेहतर है ।
दूसरी पुस्तक ऐन रैन्ड की एटलस श्रग्ड हो सकती है । दरसल बहुत सारी हो सकती हैं । किसी एक पुस्तक को दूसरे से बेहतर कहना ठीक वैसा ही है जैसे अपने एक बच्चे को दूसरे से अधिक चाहना ! फिर भी राजीव जी ने कहा है सो करना पड़ेगा । इस पुस्तक में , जैसा कि इस लेखिका की हर पुस्तक में होता है समाजवाद की धज्जियाँ उड़ाई गईं हैं । मैं उससे शत प्रतिशत सहमत हूँ । यहाँ मैं यह बता दूँ कि मैंने समाज के दोनों पहलू देखें हैं । जन्म लिया कामगार वर्ग में और आज मेनेजमेन्ट वर्ग में पत्नी के रूप में हूँ । सो दोनों वर्गों का दर्द समझ सकती हूँ । जानती हूँ कि पिताजी के पास हमारे लिए व अपने लिए, अपने भगवान के लिए समय था पर मेरे पति के पास स्वयं के लिए समय नहीं है । हर समाज में लगभग १ प्रतिशत या उससे भी कम ऐसे लोग होते हैं जो समाज की गाड़ी चलाते हैं, क्यों , पता नहीं । पर वे चलाते जाते हैं ओर उन्हीं के बल पर यह समाज टिका हुआ है । अब आप चाहें तो उन्हें सूली पर लटका दें । पर यह सच है ।
चलचित्र... मैं देखती ही नहीं । देख सकती भी नहीं , क्योंकि कोई थिएटर कभी भी आसपास नहीं था । अपने कॉलेज के दिनों में जब टेबल टेनिस के लिए अपनी यूनिवर्टी के लिए मैच खेलने लखनऊ गई थी तब कुछ फिल्में देखी थीं । तब ही बैजू बाँवरा देखी थी । उसके गाने मुझे इतने पसन्द आए कि अगले ही दिन फिर से देखने पहुँच गई ।
दूसरी साहिब बीबी और गुलाम हो सकती है । बहुत सी स्त्रियाँ उस फिल्म की नायिका मीना कुमारी जितनी ही अकेली हैं । कारण कुछ भी हों , पति जो भी करे, अच्छा या बुरा, अकेलापन तो अकेलापन ही है । आप अपने पति पर गर्व कर सकती हैं किन्तु अकेलेपन का दंश इससे कम नहीं होता, सो मैं उसका दर्द समझ सकती हूँ । अन्तर इतना ही है कि आप अपने जीवन को कौन सा मोड़ देंगे । मेरा मोड़ रचनात्मक रहा । पढ़ना लिखना मेरा जीवन बन गया । मीना कुमारी उस फिल्म में यह न कर सकी ।
प्रश्नन २ इन में से आप क्या अधिक पसन्द करते हैं पहले और दूसरे नम्बर पर चुनें - चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढ़ना, या टिप्पणी करना, या टिप्पणी पढ़ना (कोई विवरण, तर्क, कारण हो तो बेहतर)उत्तर ....चिट्ठा लिखने से तो कुछ भी बेहतर है । .चिट्ठा लिखना कुछ कुछ बच्चे को जन्म देने जैसा है, सो कठिन है । पढ़ना सबसे सरल है । पर टिप्पणी करना दूसरे दर्जे की सरलता में आता है । इसमें तर्क की बात ही कहाँ से आती है ? दूसरे के बच्चे को पुचकारना अपना बच्चा पैदा करने से कभी भी सरल है ।
वैसे एक बात है , मुझे लगता है चिट्ठा लिखना , पढ़ना ,टिप्पणी करना व पढ़ना हमें एक दूसरे के विचारों से मिलवाता है। यदि आपको आपत्ति न हो तो कहूँगी कि ..
It's a kind of meeting of minds. Minds that get free from the limitations of physical bodies, time and space and and in the cyberspace they meet, touch, influence and merge . I think , this cyber world , blogging and chatting are about the best things that happened to humankind in the last century. No other means of communication can compete with it. I am sure, the net is going to make the world a better place, because we are learning to share ideas and understand each other much better than ever before.
बस एक ही बुराई है इस सबमें कि यह सब पुस्तकें पढ़ने के समय पर डाका डालता है ।
प्रश्नन ३ आपकी अपने चिट्ठे की और अन्य चिट्ठाकार की लिखी हुई पसंदीदा पोस्ट कौन-कौन सी हैं?(पसंदीदा चिट्ठाकार और सर्वाधिक पसंदीदा पोस्ट का लेखक भिन्न हो सकते हैं)उत्तर ...यह भी कठिन है । अपनी बताना तो सरल है क्योंकि हमें तो जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए हैं । सो मेरी कविता उड़ने की चाहत मेरी सदा पसंदीदा पोस्ट रहेगी । क्योंकि मैं सच में उड़ना चाहती हूँ । मैं अपने सपनों में भी उड़ती हूँ । दुर्भाग्य से उस ही पोस्ट को सबसे कम लोगों ने पढ़ा । पर वह ही मेरी कहानी कहती है ।
मेरे खयाल से बचपन से ये उड़ने के स्वप्न देखना शायद हर प्रकार की स्वतंत्रता के प्रति मेरा दृढ़ विश्वास ,आस्था व लगन दर्शाता है । मुझे किसी भी प्रकार के बंधन सह्य नहीं हैं । न मैं किसी प्रकार की पराधीनता को स्वीकार कर सकती हूँ न किसी पर यह थोप सकती हूँ । यह स्वतंत्रता से प्रेम इस सीमा तक है कि मैं कभी एन सी सी आदि को भी न सह सकी। मैं किसी के कहने पर क्यों बाँया पैर उठाऊँ मुझे कभी समझ नहीं आया । बात हास्यास्पद तो है किन्तु सच है।
अन्य चिट्ठाकार में सृजन शिल्पी की सुभाष चन्द्र बोस पर लिखी पोस्ट है । वैसे उनकी गाँधी जी पर लिखी पोस्ट भी पसन्द है, जिससे मैं कतई भी सहमत नहीं हूँ ।
मुझे सुनील दीपक के कैमरे से कैद कुछ चित्र बहुत पसन्द हैं । उनकी समलेंगिकों पर लिखी रचना भी अच्छी लगी ।
प्रश्न4. आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
मैं भावना प्रधान व्यक्ति हूँ । सो भावनाओं से ओत प्रोत चिट्ठे पसन्द हैं । पर जानती हूँ जीवन भावनाओं से परे भी कुछ है । सो सब तरह के चिट्ठे पढ़ती हूँ । हास्य भी अच्छा लगता है । मुझे नई पीढ़ी के लोगों का लिखा पढ़ना पसन्द है क्योंकि मुझे लगता है कि वे ही संसार को बेहतर बनाएँगे और उनके चिट्ठों से उनकी नब्ज पहचानी जा सकती है । प्रसन्नता की बात यह है कि वे अच्छा लिखते हैं , अच्छा सोचते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वे हिन्दी में लिख रहें हैं सो मेरा यह संशय कि हिन्दी लुप्त हो जाएगी दूर हो गया है ।
प्रश्न ५ चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नति हुई है(जो किसी व्यवसाय अथवा सेवा में नहीं हैं वे अन्य प्रश्न चुनें)
नहीं भाई, कुछ बदलाव नहीं हुआ है सिवाय इसके कि लगता है कि कोई हमारी भी सुन रहा है । और यह भी पता चल गया कि हम ही एक भावुक अजूबे नहीं हैं बहुत से और भी इस रोग से ग्रस्त हैं । अभी तो यहाँ नई हूँ पर लगता है यह मुझे शायद एक बेहतर अध्यापिका भी बना दे ।
6. आपके मनपसन्द चिट्ठाकार कौन है और क्यों?
यह तो पिटवाने वाली बात है । कैसे कहें कौन पसन्द है ? बाँकी लोग हमारा चिट्ठा पढ़ना बंद न कर देंगे ? सो भाई लोगों हमें माफ करना, इसका उत्तर नहीं दे सकते । सो अब क्या कहें ? किसी बच्चे का नाम ले सकते हैं पर वह हमें शायद माफ न करे । कुछ नवयुवक हैं जो हमारे भविष्य हैं । उन्हें मेरा सादर प्रणाम !
7. अपने जीवन की सबसे धमाकेदार, सनसनीखेज, रोमांचकारी घटना बतायें(इसके उत्तर में विवाह की घटना का उल्लेख मान्य नहीँ है ;) )
भई ऐसा धमाका हुआ था कि आज तक नहीं भूले हैं । न कभी भूल पाएँ । आशा है बच्चे इसे नहीं पढ़ रहे । यह घटना एक पल ,एक दिन या एक सप्ताह की भी नहीं है । कुछ इतना खिंच गई कि लगभग बीस दिन चली ।
चलो छोड़ते हैं इसे और अगले प्रश्न को हल करते हैं । वैसे ही बहुत लम्बा खिंच गया है
8. आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? और क्यों?उत्तर बहुत से लोगों से मिलना चाहूँगी । अपने परिवार के सदस्यों के अलावा मैं आजतक किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिली जिसकी पढ़ने में रुचि हो । कारण मेरा जन्म से लेकर आजतक का जिया वनवास है । सो अपने जैसी रुचि वालों से मिलना सौभाग्य होगा । कैसा लगेगा जब पुस्तकों पर चर्चा होगी ! जब शब्दों से खेलेंगे! मुझे शब्द बहुत मोहित करते हैं । कई बार तो वे मनुष्यों से भी अधिक जीवंत लगते हैं । अच्छे अच्छे शब्द जब मुख से निकलते होंगे तो कैसा लगता होगा ! आजतक तो वे मुझे केवल पुस्तकों में से झाँकते ही मिलते हैं । जब चर्चा मुद्दों पर होगी, कुछ बहस भी हो शायद !
मैं सुनील दीपक जी से मिलना चाहूँगी क्योंकि कुछ विषयों पर उनके विचार मुझे कुछ कुछ अपने जैसे लगे । वैसे अभी कम दिन हुए हैं मुझे यहाँ आए इसलिए कोई भी धारणा बनाना गलत होगा । सृजन जी व उनकी पत्नी से मिलना चाहूँगी । वैसे हमारे विचार बहुत अलग हैं शायद ।
या शायद न मिलना चाहूँ , कहीं ऐसा न हो जीवन के बहुत से अन्य भ्रमों की भाँति पढ़ने लिखने का चाव रखने वालों के बारे में जो मेरा विचार है वह भी न टूट जाए ।
आशा है यदि प्रथम श्रेणी न भी दें तो उत्तीर्ण तो राजीव जी कर ही देंगे ।
धन्यवाद ।
मुझे नहीं लगता कि कोई भी सदस्य अब तक उत्तर देने से बचा होगा ।
खैर हम पूछ ही लेते हैं ।
मेरे प्रश्न ये है
प्रश्न१ एक अच्छी पुस्तक और एक अच्छे टी वी कार्यक्रम में से आप क्या चुनेंगे ?
प्रश्न२ यदि एक सप्ताह तक आपको कमप्यूटर से दूर रहना पड़े तो आपको कैसा लगेगा ?
प्रश्न३ यदि आपकी सलाह से भगवान काम करने लगे तो आप उसे पहली सलाह क्या और क्यों देंगे ?
प्रश्न४ यदि आपको किसी पत्रिका का सम्पादक बना दिया जाए तो आप किन चिट्ठाकारों की रचनाएँ अपनी पत्रिका में छापेगें ?
प्रश्न५ यदि आपको जीवन का कोई एक दिन फिर से जीने को मिले तो वह कौन सा होगा और क्यों ?
मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं ...
अचानक गणित याद आया, मेरा प्रिय विषय और मैं क्या मूर्खता करने जा रही थी ? यदि हर व्यक्ति ५ लोगों से प्रश्न पूछेगा और यह क्रम चलता रहेगा तो यदि १ व्यक्ति से आरम्भ करें तो ५वें राउन्ड तक ७८१ लोग उत्तर दे चुके होंगे । तो अब मेरी पकड़ में कौन आएगा ?
फिर भी यत्न तो करा ही जा सकता है। मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं .
१ अभय तिवारी जी
२ अतुल शर्मा जी
३ देवेश वशिष्ठ जी
४ पूनम जी
५ रजनी भार्गव जी
देर से उत्तर देने के लिए क्षमा चाहती हूँ । जब आपको पता चलेगा कि मेरा आधे से भी अधिक समय नेट कनेक्ट करने में जाता है और मेरे नेट की गति कभी ४.५ के बी पी एस तो कभी १४ होती है तो आप मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे ।
और अपने नेट से संघर्ष करते अभी अभी मान्या जी के उत्तरों पर पहुँची तो पाया उन्होंने भी प्रश्न किये हैं । सो रात के ढाई बज रहे हैं , अब अपनी यह उत्तर पुस्तिका जमा कराती हूँ, मान्या जी के उत्तर अगले अंक में ।वैसे अब सुबह के ४ बजने वाले हैं और मेरा नेट से युद्ध जारी है । पर आज भेज कर ही रहूँगी ।
घुघूती बासूती
अपनी सुविधानुसार कोई भी पाँच उत्तर चुन लें, सभी समान महत्व के हैं ।
हममम् !हम तो किनारे खड़े होकर मजा ले रहे थे । भई, जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए थे हमें चिट्ठाकारिता में । कम ही लोगों को पता था कि कोई घुघूती बासूती नामक चिड़िया चिट्ठाकारिता के आकाश में विचरण करती है । सो हम तो अपनी गुमनामी में बहुत सुरक्षित महसूस कर रहे थे । कभी सोचा भी न था कि कोई हमारा नाम भी इस प्रश्नोत्तर के खेल में सुझाएगा । खैर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? सो हम भी इस चपेट में आ गए । और मजा यह कि हमें पता भी न चला । हम तो खुशी खुशी अपने छात्रों के प्रश्नपत्र बना रहे थे, हमें क्या पता था यहाँ हमारे लिए भी प्रश्नपत्र बन रहे हैं । राजीव जी, सच सच बताना, आपकी हमारे किसी छात्र से तो कोई साँठ गाँठ तो नहीं है । किसी छात्र ने तो हमारा नाम नहीं सुझाया था ? यदि ऐसा कुछ है तो अभी भी परिक्षाएँ बाँकी है और हम उसे ....
खैर, अब जब ऊखल में सिर दिया है तो मूसल से क्या डरना ? सो हम शुरू हो जाते हैं ।
प्रश्न १ आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र (फिल्म) कौन सी है?
उत्तर ..पुस्तकें तो मेरे लिए ऐसी हैं जैसे प्यासे के लिए पानी । कुछ भी पढ़ सकती हूँ । बस शब्द हिन्दी या अंग्रेजी में होने चाहिए । हिन्दी की पुस्तकें पढ़े जमाना बीत गया है । पढ़ना चाहती हूँ पर जहाँ भी मैं रहती हूँ वहाँ मिलती नहीं । सो अंग्रेजी में मुझे एलेक्स हेली की रूट्स बहुत प्रिय है । यह अमेरिका में काले लोगों की कहानी है, कैसे उन्हें अफ्रीका से पकड़ा गया और कैसे उन्हें जहाजोँ द्वारा अमेरिका लाया गया , गुलाम बनाया गया, भागने पर सजा दी गईं आदि
आदि । यह पुस्तक किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी है । मैं इसे पढ़कर अपने आँसू काबू नहीं कर पाई । यह पुस्तक पढ़े जमाना बीत गया पर आज भी किन्टा कुन्टे(या शायद कुन्टा किन्टे), इस पुस्तक का नायक, मेरे मानस पटल पर बसा हुआ है । मेरे लिए किन्टा उतना ही जीवन्त है जैसे मैं स्वयं । इस पुस्तक ने मुझे सिखाया कि मृत्यु से भयानक हो सकता है जीवन । स्वतन्त्र मरना गुलाम जीने से बेहतर है ।
दूसरी पुस्तक ऐन रैन्ड की एटलस श्रग्ड हो सकती है । दरसल बहुत सारी हो सकती हैं । किसी एक पुस्तक को दूसरे से बेहतर कहना ठीक वैसा ही है जैसे अपने एक बच्चे को दूसरे से अधिक चाहना ! फिर भी राजीव जी ने कहा है सो करना पड़ेगा । इस पुस्तक में , जैसा कि इस लेखिका की हर पुस्तक में होता है समाजवाद की धज्जियाँ उड़ाई गईं हैं । मैं उससे शत प्रतिशत सहमत हूँ । यहाँ मैं यह बता दूँ कि मैंने समाज के दोनों पहलू देखें हैं । जन्म लिया कामगार वर्ग में और आज मेनेजमेन्ट वर्ग में पत्नी के रूप में हूँ । सो दोनों वर्गों का दर्द समझ सकती हूँ । जानती हूँ कि पिताजी के पास हमारे लिए व अपने लिए, अपने भगवान के लिए समय था पर मेरे पति के पास स्वयं के लिए समय नहीं है । हर समाज में लगभग १ प्रतिशत या उससे भी कम ऐसे लोग होते हैं जो समाज की गाड़ी चलाते हैं, क्यों , पता नहीं । पर वे चलाते जाते हैं ओर उन्हीं के बल पर यह समाज टिका हुआ है । अब आप चाहें तो उन्हें सूली पर लटका दें । पर यह सच है ।
चलचित्र... मैं देखती ही नहीं । देख सकती भी नहीं , क्योंकि कोई थिएटर कभी भी आसपास नहीं था । अपने कॉलेज के दिनों में जब टेबल टेनिस के लिए अपनी यूनिवर्टी के लिए मैच खेलने लखनऊ गई थी तब कुछ फिल्में देखी थीं । तब ही बैजू बाँवरा देखी थी । उसके गाने मुझे इतने पसन्द आए कि अगले ही दिन फिर से देखने पहुँच गई ।
दूसरी साहिब बीबी और गुलाम हो सकती है । बहुत सी स्त्रियाँ उस फिल्म की नायिका मीना कुमारी जितनी ही अकेली हैं । कारण कुछ भी हों , पति जो भी करे, अच्छा या बुरा, अकेलापन तो अकेलापन ही है । आप अपने पति पर गर्व कर सकती हैं किन्तु अकेलेपन का दंश इससे कम नहीं होता, सो मैं उसका दर्द समझ सकती हूँ । अन्तर इतना ही है कि आप अपने जीवन को कौन सा मोड़ देंगे । मेरा मोड़ रचनात्मक रहा । पढ़ना लिखना मेरा जीवन बन गया । मीना कुमारी उस फिल्म में यह न कर सकी ।
प्रश्नन २ इन में से आप क्या अधिक पसन्द करते हैं पहले और दूसरे नम्बर पर चुनें - चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढ़ना, या टिप्पणी करना, या टिप्पणी पढ़ना (कोई विवरण, तर्क, कारण हो तो बेहतर)उत्तर ....चिट्ठा लिखने से तो कुछ भी बेहतर है । .चिट्ठा लिखना कुछ कुछ बच्चे को जन्म देने जैसा है, सो कठिन है । पढ़ना सबसे सरल है । पर टिप्पणी करना दूसरे दर्जे की सरलता में आता है । इसमें तर्क की बात ही कहाँ से आती है ? दूसरे के बच्चे को पुचकारना अपना बच्चा पैदा करने से कभी भी सरल है ।
वैसे एक बात है , मुझे लगता है चिट्ठा लिखना , पढ़ना ,टिप्पणी करना व पढ़ना हमें एक दूसरे के विचारों से मिलवाता है। यदि आपको आपत्ति न हो तो कहूँगी कि ..
It's a kind of meeting of minds. Minds that get free from the limitations of physical bodies, time and space and and in the cyberspace they meet, touch, influence and merge . I think , this cyber world , blogging and chatting are about the best things that happened to humankind in the last century. No other means of communication can compete with it. I am sure, the net is going to make the world a better place, because we are learning to share ideas and understand each other much better than ever before.
बस एक ही बुराई है इस सबमें कि यह सब पुस्तकें पढ़ने के समय पर डाका डालता है ।
प्रश्नन ३ आपकी अपने चिट्ठे की और अन्य चिट्ठाकार की लिखी हुई पसंदीदा पोस्ट कौन-कौन सी हैं?(पसंदीदा चिट्ठाकार और सर्वाधिक पसंदीदा पोस्ट का लेखक भिन्न हो सकते हैं)उत्तर ...यह भी कठिन है । अपनी बताना तो सरल है क्योंकि हमें तो जुम्मे जुम्मे बीस दिन हुए हैं । सो मेरी कविता उड़ने की चाहत मेरी सदा पसंदीदा पोस्ट रहेगी । क्योंकि मैं सच में उड़ना चाहती हूँ । मैं अपने सपनों में भी उड़ती हूँ । दुर्भाग्य से उस ही पोस्ट को सबसे कम लोगों ने पढ़ा । पर वह ही मेरी कहानी कहती है ।
मेरे खयाल से बचपन से ये उड़ने के स्वप्न देखना शायद हर प्रकार की स्वतंत्रता के प्रति मेरा दृढ़ विश्वास ,आस्था व लगन दर्शाता है । मुझे किसी भी प्रकार के बंधन सह्य नहीं हैं । न मैं किसी प्रकार की पराधीनता को स्वीकार कर सकती हूँ न किसी पर यह थोप सकती हूँ । यह स्वतंत्रता से प्रेम इस सीमा तक है कि मैं कभी एन सी सी आदि को भी न सह सकी। मैं किसी के कहने पर क्यों बाँया पैर उठाऊँ मुझे कभी समझ नहीं आया । बात हास्यास्पद तो है किन्तु सच है।
अन्य चिट्ठाकार में सृजन शिल्पी की सुभाष चन्द्र बोस पर लिखी पोस्ट है । वैसे उनकी गाँधी जी पर लिखी पोस्ट भी पसन्द है, जिससे मैं कतई भी सहमत नहीं हूँ ।
मुझे सुनील दीपक के कैमरे से कैद कुछ चित्र बहुत पसन्द हैं । उनकी समलेंगिकों पर लिखी रचना भी अच्छी लगी ।
प्रश्न4. आप किस तरह के चिट्ठे पढ़ना पसन्द करते हैं?
मैं भावना प्रधान व्यक्ति हूँ । सो भावनाओं से ओत प्रोत चिट्ठे पसन्द हैं । पर जानती हूँ जीवन भावनाओं से परे भी कुछ है । सो सब तरह के चिट्ठे पढ़ती हूँ । हास्य भी अच्छा लगता है । मुझे नई पीढ़ी के लोगों का लिखा पढ़ना पसन्द है क्योंकि मुझे लगता है कि वे ही संसार को बेहतर बनाएँगे और उनके चिट्ठों से उनकी नब्ज पहचानी जा सकती है । प्रसन्नता की बात यह है कि वे अच्छा लिखते हैं , अच्छा सोचते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वे हिन्दी में लिख रहें हैं सो मेरा यह संशय कि हिन्दी लुप्त हो जाएगी दूर हो गया है ।
प्रश्न ५ चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नति हुई है(जो किसी व्यवसाय अथवा सेवा में नहीं हैं वे अन्य प्रश्न चुनें)
नहीं भाई, कुछ बदलाव नहीं हुआ है सिवाय इसके कि लगता है कि कोई हमारी भी सुन रहा है । और यह भी पता चल गया कि हम ही एक भावुक अजूबे नहीं हैं बहुत से और भी इस रोग से ग्रस्त हैं । अभी तो यहाँ नई हूँ पर लगता है यह मुझे शायद एक बेहतर अध्यापिका भी बना दे ।
6. आपके मनपसन्द चिट्ठाकार कौन है और क्यों?
यह तो पिटवाने वाली बात है । कैसे कहें कौन पसन्द है ? बाँकी लोग हमारा चिट्ठा पढ़ना बंद न कर देंगे ? सो भाई लोगों हमें माफ करना, इसका उत्तर नहीं दे सकते । सो अब क्या कहें ? किसी बच्चे का नाम ले सकते हैं पर वह हमें शायद माफ न करे । कुछ नवयुवक हैं जो हमारे भविष्य हैं । उन्हें मेरा सादर प्रणाम !
7. अपने जीवन की सबसे धमाकेदार, सनसनीखेज, रोमांचकारी घटना बतायें(इसके उत्तर में विवाह की घटना का उल्लेख मान्य नहीँ है ;) )
भई ऐसा धमाका हुआ था कि आज तक नहीं भूले हैं । न कभी भूल पाएँ । आशा है बच्चे इसे नहीं पढ़ रहे । यह घटना एक पल ,एक दिन या एक सप्ताह की भी नहीं है । कुछ इतना खिंच गई कि लगभग बीस दिन चली ।
चलो छोड़ते हैं इसे और अगले प्रश्न को हल करते हैं । वैसे ही बहुत लम्बा खिंच गया है
8. आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है? और क्यों?उत्तर बहुत से लोगों से मिलना चाहूँगी । अपने परिवार के सदस्यों के अलावा मैं आजतक किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिली जिसकी पढ़ने में रुचि हो । कारण मेरा जन्म से लेकर आजतक का जिया वनवास है । सो अपने जैसी रुचि वालों से मिलना सौभाग्य होगा । कैसा लगेगा जब पुस्तकों पर चर्चा होगी ! जब शब्दों से खेलेंगे! मुझे शब्द बहुत मोहित करते हैं । कई बार तो वे मनुष्यों से भी अधिक जीवंत लगते हैं । अच्छे अच्छे शब्द जब मुख से निकलते होंगे तो कैसा लगता होगा ! आजतक तो वे मुझे केवल पुस्तकों में से झाँकते ही मिलते हैं । जब चर्चा मुद्दों पर होगी, कुछ बहस भी हो शायद !
मैं सुनील दीपक जी से मिलना चाहूँगी क्योंकि कुछ विषयों पर उनके विचार मुझे कुछ कुछ अपने जैसे लगे । वैसे अभी कम दिन हुए हैं मुझे यहाँ आए इसलिए कोई भी धारणा बनाना गलत होगा । सृजन जी व उनकी पत्नी से मिलना चाहूँगी । वैसे हमारे विचार बहुत अलग हैं शायद ।
या शायद न मिलना चाहूँ , कहीं ऐसा न हो जीवन के बहुत से अन्य भ्रमों की भाँति पढ़ने लिखने का चाव रखने वालों के बारे में जो मेरा विचार है वह भी न टूट जाए ।
आशा है यदि प्रथम श्रेणी न भी दें तो उत्तीर्ण तो राजीव जी कर ही देंगे ।
धन्यवाद ।
मुझे नहीं लगता कि कोई भी सदस्य अब तक उत्तर देने से बचा होगा ।
खैर हम पूछ ही लेते हैं ।
मेरे प्रश्न ये है
प्रश्न१ एक अच्छी पुस्तक और एक अच्छे टी वी कार्यक्रम में से आप क्या चुनेंगे ?
प्रश्न२ यदि एक सप्ताह तक आपको कमप्यूटर से दूर रहना पड़े तो आपको कैसा लगेगा ?
प्रश्न३ यदि आपकी सलाह से भगवान काम करने लगे तो आप उसे पहली सलाह क्या और क्यों देंगे ?
प्रश्न४ यदि आपको किसी पत्रिका का सम्पादक बना दिया जाए तो आप किन चिट्ठाकारों की रचनाएँ अपनी पत्रिका में छापेगें ?
प्रश्न५ यदि आपको जीवन का कोई एक दिन फिर से जीने को मिले तो वह कौन सा होगा और क्यों ?
मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं ...
अचानक गणित याद आया, मेरा प्रिय विषय और मैं क्या मूर्खता करने जा रही थी ? यदि हर व्यक्ति ५ लोगों से प्रश्न पूछेगा और यह क्रम चलता रहेगा तो यदि १ व्यक्ति से आरम्भ करें तो ५वें राउन्ड तक ७८१ लोग उत्तर दे चुके होंगे । तो अब मेरी पकड़ में कौन आएगा ?
फिर भी यत्न तो करा ही जा सकता है। मैं ये प्रश्न जिनसे पूछना चाहती हूँ उनके नाम हैं .
१ अभय तिवारी जी
२ अतुल शर्मा जी
३ देवेश वशिष्ठ जी
४ पूनम जी
५ रजनी भार्गव जी
देर से उत्तर देने के लिए क्षमा चाहती हूँ । जब आपको पता चलेगा कि मेरा आधे से भी अधिक समय नेट कनेक्ट करने में जाता है और मेरे नेट की गति कभी ४.५ के बी पी एस तो कभी १४ होती है तो आप मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे ।
और अपने नेट से संघर्ष करते अभी अभी मान्या जी के उत्तरों पर पहुँची तो पाया उन्होंने भी प्रश्न किये हैं । सो रात के ढाई बज रहे हैं , अब अपनी यह उत्तर पुस्तिका जमा कराती हूँ, मान्या जी के उत्तर अगले अंक में ।वैसे अब सुबह के ४ बजने वाले हैं और मेरा नेट से युद्ध जारी है । पर आज भेज कर ही रहूँगी ।
घुघूती बासूती
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